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कीर्तिमान कार्यालय में चर्चा करते हुए दाऊलाल चंद्राकर एवं नुकेश चंद्राकर।
कीर्तिमान कार्यालय में चर्चा करते हुए दाऊलाल चंद्राकर एवं नुकेश चंद्राकर।
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सियासी चिंतन : सत्ता की होड़ में सिमटती राजनीति और मूल मुद्दों से भटकता जनहित...स्वस्थ समाज के लिए शुभ संकेत नहीं

यदि राजनीति को पुनः जनसेवा का माध्यम बनाना है, तो सभी पक्षों जैसे राजनीतिक दलों, नेताओं, मीडिया और नागरिकों को मिलकर प्रयास करना होगा। अन्यथा, लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित होकर रह जाएगा, जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
18 Apr 2026, 04:38 PM
महासमुंद

छत्तीसगढ़ की बदलती राजनीतिक तस्वीर पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वरिष्ठ सियासतदां दाऊलाल चंद्राकर और सेवानिवृत एसडीओ इंजीनियर नुकेश चंद्राकर ने कहा है कि वर्तमान समय में राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटककर चुनावी गणित तक सीमित हो गई है। कीर्तिमान कार्यालय में पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र से विशेष बातचीत के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब राजनीति किसी विचारधारा या सिद्धांत की बजाय सत्ता प्राप्ति का माध्यम बनती जा रही है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है।

उन्होंने कहा कि पहले राजनीति का आधार विचार, संघर्ष और समाजहित हुआ करता था। समाजवादी दौर के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उस समय नेताओं के लिए जनता का विश्वास और उनके मुद्दे सर्वोपरि होते थे। लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत है, पांच वर्षों का पूरा कार्यकाल केवल अगले चुनाव की रणनीति बनाने में बीत जाता है। जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल लगातार इस चिंता में लगे रहते हैं कि किस तरह मतदाताओं को प्रभावित किया जाए, न कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान कैसे किया जाए।

दाऊलाल चंद्राकर ने कहा कि सत्ता की लोलुपता और व्यक्तिगत स्वार्थ की बढ़ती प्रवृत्ति ने राजनीति की दिशा ही बदल दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार राजनीतिक दल जनता के वास्तविक मुद्दों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को नजरअंदाज कर देते हैं और उसकी जगह अल्पकालिक प्रलोभनों का सहारा लेते हैं। इससे आम नागरिक का ध्यान उसकी मूल समस्याओं से हटकर अन्य मुद्दों की ओर मोड़ दिया जाता है।

इंजी. नुकेश चंद्राकर ने इस संदर्भ में कहा कि राजनीति में नीतियों और सिद्धांतों का क्षरण चिंताजनक है। आज राज करने की होड़ में लोग इतने उतावले हो गए हैं कि वे किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं। राजनीतिक संवाद की मर्यादा भी प्रभावित हुई है और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव देखने को मिलता है

दोनों का यह भी माना कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए राजनीति में सूचिता, पारदर्शिता और जवाबदेही की पुनर्स्थापना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि राजनीतिक दलों को अपने संगठनात्मक ढांचे और कार्यप्रणाली में सुधार लाना चाहिए, ताकि वे चुनाव जीतने की मशीन न बनकर समाज परिवर्तन के वाहक बन सकें।

उन्होंने युवाओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया और कहा कि यदि नई पीढ़ी जागरूक होकर राजनीति में भागीदारी करती है, तो एक सकारात्मक बदलाव संभव है। साथ ही उन्होंने मीडिया की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया कि वह जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता दे और सत्ता के प्रति सजग प्रहरी की भूमिका निभाए।

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