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अबूझमाड़ में कॉफी खेती का सर्वे
अबूझमाड़ में कॉफी खेती का सर्वे
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कृषि-वनीकरण : अबूझमाड़ में कॉफी आधारित एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल पर काम, किसानों को मिलेगी नई आजीविका

छत्तीसगढ़ सरकार ने अबूझमाड़ में कॉफी की वैज्ञानिक खेती की संभावनाओं का अध्ययन शुरू किया है। भारतीय कॉफी बोर्ड और जिला प्रशासन मिलकर इस परियोजना पर काम कर रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। भविष्य में कुछ क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 07 Jul 2026, 04:19 PM · अपडेट: 10 Sep 2026, 07:39 AM
रायपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
दशकों तक घने जंगलों, भौगोलिक दुर्गमता और लंबे समय तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाला अबूझमाड़ देश के सबसे दुर्गम वन क्षेत्रों में शामिल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर विकसित करने पर विशेष ध्यान दे रही है। इसी दिशा में अबूझमाड़ में कॉफी की खेती की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया गया है, ताकि इसे भविष्य में स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाया जा सके। 
निरीक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने क्षेत्र की जलवायु, वार्षिक वर्षा, तापमान, मिट्टी की गुणवत्ता और समुद्र तल से ऊंचाई जैसे विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया। जिला प्रशासन के अनुसार, भारतीय कॉफी बोर्ड ने अपनी प्रारंभिक जांच में पाया कि अबूझमाड़ में कॉफी आधारित कृषि-वनीकरण (एग्रोफॉरेस्ट्री) विकसित करने के लिए अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियां मौजूद हैं। 

कॉफी आधारित खेती से होगा पर्यावरण संरक्षण

भारतीय कॉफी बोर्ड इस परियोजना के विभिन्न चरणों में भूमि चयन, नर्सरी विकास, पौधरोपण, तकनीकी प्रशिक्षण, बागान प्रबंधन और अन्य वैज्ञानिक पहलुओं पर लगातार मार्गदर्शन देगा। प्रारंभिक चरण में उपयुक्त भूमि की पहचान और नर्सरी स्थापित करने का कार्य किया जाएगा, जिसके बाद कॉफी के पौधे लगाए जाएंगे। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) के अंतर्गत उद्यानिकी एवं अनुसंधान केंद्र, जगदलपुर द्वारा प्रकाशित तकनीकी पुस्तिका "कॉफी इन छत्तीसगढ़" में बस्तर को जैविक कॉफी उत्पादन के लिए अत्यंत संभावनाशील क्षेत्र बताया गया है। दरभा क्षेत्र में किए गए प्रयोगों के आधार पर पुस्तिका में उल्लेख किया गया है कि यहां की वर्षा, ऊंचाई, उपजाऊ वन मिट्टी और छायादार वन संरचना कॉफी की सफल खेती के लिए उपयुक्त है। तकनीकी पुस्तिका के अनुसार, कॉफी आधारित कृषि-वनीकरण से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। छायादार पेड़ मिट्टी का संरक्षण करते हैं, पत्तियों के माध्यम से पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण होता है, मिट्टी के कटाव में कमी आती है, जैव विविधता सुरक्षित रहती है और कॉफी के पौधों को अत्यधिक गर्मी या मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से सुरक्षा मिलती है।

प्राकृतिक संसाधनों के साथ होगा विकास

जिला प्रशासन का मानना है कि यह परियोजना अबूझमाड़ के लोगों के लिए आय और रोजगार का नया स्रोत बन सकती है। कॉफी के पौधों से लगभग चार वर्ष बाद व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने की संभावना है, जिसके बाद कई वर्षों तक किसानों को नियमित आय प्राप्त हो सकेगी। इस पहल पर जिला कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य अबूझमाड़ की प्राकृतिक विशेषताओं और समृद्ध वन संपदा के आधार पर विकास का नया मॉडल तैयार करना है। उनके अनुसार, कॉफी स्थानीय समुदायों के लिए टिकाऊ आजीविका का मजबूत विकल्प बन सकती है। उन्होंने कहा कि भारतीय कॉफी बोर्ड के तकनीकी सहयोग से इस परियोजना को वैज्ञानिक और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों के बीच संतुलन बना रहे तथा स्थानीय लोग अपनी प्राकृतिक संपदा से दीर्घकालिक लाभ प्राप्त कर सकें। 

चाय की खेती पर विचार

परियोजना के सफल संचालन के लिए जिला कृषि विभाग के अधिकारियों को ओडिशा के कोरापुट स्थित भारतीय कॉफी बोर्ड के क्षेत्रीय केंद्र में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। वहां उन्हें कॉफी की वैज्ञानिक खेती, नर्सरी विकास, बागान प्रबंधन और फसल प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। कॉफी के साथ-साथ विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चा में अबूझमाड़ के कुछ क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाएं भी सामने आई हैं। इस पर जिला कलेक्टर ने अधिकारियों को चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं, ताकि भविष्य में इस विकल्प पर भी गंभीरता से काम किया जा सके। 

अबूझमाड़ के विकास की नई राह

हालांकि यह पहल अभी प्रारंभिक मूल्यांकन चरण में है, लेकिन यह छत्तीसगढ़ के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में विकास की नई सोच को दर्शाती है। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो अबूझमाड़ में वैज्ञानिक योजना, सामुदायिक सहभागिता और पर्यावरण संरक्षण पर आधारित एक टिकाऊ आजीविका मॉडल विकसित हो सकता है। इससे स्थानीय लोगों के लिए नए आर्थिक अवसर खुलेंगे और साथ ही इस क्षेत्र की अनूठी वन संपदा का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।
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