ऊंचे टावरों से जंगलों पर 24 घंटे नजर

एआई कैमरे करेंगे वन्यजीवों की स्वतः पहचान
इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एआई कैमरे हाथी, बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे प्रमुख वन्यजीवों की स्वतः पहचान कर सकेंगे। साथ ही शिकारी, लकड़ी तस्कर और अवैध घुसपैठ जैसी संदिग्ध गतिविधियों का भी तुरंत पता लगा सकेंगे। बाघ या हाथियों के रिहायशी इलाकों के पास आने पर वन विभाग को तुरंत सूचना देगा। जैसे ही किसी वन्यजीव या संदिग्ध व्यक्ति की पहचान होगी, सिस्टम व्हाट्सएप के माध्यम से वन कर्मियों और अधिकारियों को तुरंत अलर्ट भेजेगा। इससे मौके पर तेजी से कार्रवाई करना संभव होगा और वन्यजीवों की सुरक्षा बेहतर होगी।
दुर्गम जंगलों तक पहुंचेगी कनेक्टिविटी
पी2पी वायरलेस तकनीक के माध्यम से दूरस्थ वन क्षेत्रों में भी इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे एंटी-पोचिंग कैंपों और वन चौकियों तक लाइव वीडियो और रियल-टाइम निगरानी संभव हो सकेगी। पी2पी का अर्थ 'पीयर-टू-पीयर' या 'पॉइंट-टू-पॉइंट' सीधा कनेक्शन है। इसमें किसी केंद्रीय सर्वर या बीच के माध्यम की जरूरत नहीं होती है और दो या दो से अधिक डिवाइस या स्थान सीधे आपस में जुड़कर डेटा साझा करते हैं। वन विभाग में सीमित मानव संसाधन की चुनौती को देखते हुए यह एआई प्रणाली फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में काम करेगी। इससे गश्त की क्षमता बढ़ेगी, निगरानी मजबूत होगी और संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी।

आधुनिक तकनीक से मजबूत हुआ संरक्षण अभियान
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व पहले से थर्मल ड्रोन, उपग्रह चित्रों और भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग कर रहा है। नई एआई प्रणाली इन प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाएगी। पिछले चार वर्षों में रिजर्व ने 956 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया है और 500 से अधिक तस्करों व शिकारियों की गिरफ्तारी की है। बेहतर संरक्षण के कारण यहां कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों का भी सफल दस्तावेजीकरण हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना मध्य भारत में एआई आधारित वन और वन्यजीव संरक्षण की सबसे उन्नत पहलों में से एक है। भविष्य में यह मॉडल देश के अन्य संरक्षित क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है। परियोजना के तहत प्रत्येक टावर, एआई कैमरा, पी2पी कनेक्टिविटी और अन्य आवश्यक संरचनाओं पर लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये का खर्च आएगा। यह निवेश वन सुरक्षा, वन्यजीव संरक्षण और तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि वन, वन्यजीव और वनांचल में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक दूरदर्शी और प्रभावी प्रयास है।