Arang News: आरंग इलाके के माना-तूता में पूर्वजों के खून-पसीने से सींचे गए मानव-निर्मित जंगल पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं। 'चित्रोत्पला फिल्म सिटी' परियोजना के लिए इस क्षेत्र की जमीन के इस्तेमाल की खबरों के बीच, 'माना-तूता जंगल संघर्ष समिति' ने मोर्चा खोल दिया है। इस हरे-भरे जंगल को बचाने के लिए समिति ने अब छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज से औपचारिक रूप से हस्तक्षेप करने और सहयोग की अपील की है।
बंजर जमीन पर पीढ़ियों की मेहनत से खड़ा हुआ है यह जंगल
समिति की ओर से 23 अक्टूबर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि यह जंगल प्राकृतिक रूप से नहीं उगा है। यह वह इलाका है जहां कभी सिर्फ पथरीली और बंजर जमीन हुआ करती थी, जिसे स्थानीय पूर्वजों ने अपने कठिन परिश्रम और संबल से हरा-भरा बनाया है। आज के दौर में जब एक पौधे को जिंदा रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं है, ऐसे में इस लहलहाते जंगल को उजाड़ने का मतलब केवल पेड़ों को काटना नहीं, बल्कि अपने पुरखों की मेहनत और स्थानीय पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करना है।
विकास के नाम पर तबाही नहीं, शिक्षा और स्वास्थ्य का केंद्र बने इलाका
समिति का साफ कहना है कि सरकार या प्रशासन को इस जमीन पर फिल्म सिटी बनाने के बजाय इसे एक जनहित के बड़े प्रोजेक्ट के रूप में विकसित करना चाहिए। उन्होंने मांग उठाई है कि इस क्षेत्र को उजाड़ने के बजाय यहाँ:
- एक नया महाविद्यालय खोला जाए।
- एक बड़ा सार्वजनिक पुस्तकालय बनाया जाए।
- जिले का सबसे बड़ा ऑक्सीजन हब (पर्यावरण केंद्र) स्थापित किया जाए।
समिति का मानना है कि इन सुविधाओं के आने से न केवल यहाँ के युवाओं को पढ़ाई और रोजगार के बेहतर मौके मिलेंगे, बल्कि आम जनता को भी एक शुद्ध और स्वस्थ वातावरण मिल सकेगा।
आठ महीने से जारी है संघर्ष
भले ही इस मुहिम में अभी तक ग्रामीण स्तर पर लोगों की भागीदारी थोड़ी सीमित रही हो, लेकिन कुछ जागरूक नागरिक और पर्यावरणप्रेमी पिछले आठ महीनों से लगातार इस जंगल को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब समिति इस संघर्ष को एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप देना चाहती है, जिसके लिए राजनीतिक और सामाजिक संगठनों से खुलकर आगे आने की अपील की जा रही है। "जंगल बचेगा तो जीवन बचेगा" के संदेश के साथ उतरी इस समिति का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बिठाना बेहद जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कंक्रीट के जंगल नहीं, बल्कि खुली हवा और हरी-भरी विरासत मिल सके।
रिपोर्ट - मोहनदास मानिकपुरी







