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ब्रिक्स देशों के NSA की बैठक आज
ब्रिक्स देशों के NSA की बैठक आज
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भारत-चीन : नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के NSA की बैठक आज से, क्या अजित डोभाल के सामने झुकेगा चीन?

भारत की मेजबानी में सोमवार से BRICS देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और उच्च प्रतिनिधियों की 16वीं बैठक शुरू हो रही है। दो दिवसीय इस अहम बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval करेंगे। आधिकारिक तौर पर बैठक का फोकस आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और नई तकनीकों के दुरुपयोग जैसी वैश्विक चुनौतियों पर रहेगा, लेकिन सबसे अधिक ध्यान भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद पर होगा।

कीर्तिमान न्यूज
22 Jun 2026, 07:34 AM
नई दिल्ली

भारत की मेजबानी में सोमवार से ब्रिक्स (BRICS) देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (NSA) और उच्च प्रतिनिधियों की 16वीं बैठक शुरू होने जा रही है। दो दिनों तक चलने वाली इस हाई-प्रोफाइल बैठक की कमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के हाथों में होगी। सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हो रही इस बैठक को रणनीतिक और राजनीतिक लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

वैसे तो इस बैठक का आधिकारिक एजेंडा आतंकवाद और तकनीकी खतरों से निपटना है, लेकिन पर्दे के पीछे असली नजर भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद पर टिकी हुई है।

इन मुद्दों पर केंद्रित रहेगा आधिकारिक एजेंडा

विदेश मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बैठक में दुनिया के सामने खड़ीं गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों पर मुख्य रूप से मंथन होगा।

  • तकनीक का दुरुपयोग: बैठक में इस बात पर चर्चा होगी कि कैसे नई तकनीकों और साइबर स्पेस का गलत इस्तेमाल वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है।

  • आतंकवाद पर कड़ा रुख: आतंकवाद विरोधी सहयोग को मजबूत करने के लिए ब्रिक्स के संयुक्त कार्य समूहों की रिपोर्ट और उनके निष्कर्षों की समीक्षा की जाएगी।

  • सूचना तकनीक की सुरक्षा: सूचना और संचार तकनीकों (ICT) के सुरक्षित इस्तेमाल को लेकर सदस्य देश एक साझा रणनीति पर विचार करेंगे।

डोभाल और वांग यी की मुलाकात: सीमा विवाद पर क्या बदलेगा रुख?

इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए चीन के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के उच्च प्रतिनिधि वांग यी भारत आ चुके हैं। अजित डोभाल के निमंत्रण पर हुई यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों के बीच लंबे समय से गतिरोध बना हुआ है।

हालांकि, सैन्य और राजनयिक स्तर की वार्ताओं के बाद कुछ मोर्चों से सैनिक पीछे जरूर हटे हैं, लेकिन डैपसांग और डेमचोक जैसे रणनीतिक इलाकों में पूर्ण सैन्य वापसी और पेट्रोलिंग (गश्त) के अधिकारों को लेकर पेंच अब भी फंसा हुआ है।

भारत का साफ संदेश: नई दिल्ली का रुख इस मामले में हमेशा से सख्त रहा है। भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक सीमा पर पूरी तरह से शांति बहाल नहीं होती, तब तक दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का सामान्य होना नामुमकिन है। अजित डोभाल इस बैठक में चीन के सामने डैपसांग और डेमचोक से चीनी सैनिकों की पूर्ण वापसी का मुद्दा पूरी प्रखरता से उठा सकते हैं।

चीन की दोहरी नीति: कथनी और करनी की परीक्षा

रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक बीजिंग की कथनी और करनी को परखने का एक बड़ा जरिया बनेगी। चीन हमेशा से एक ऐसी रणनीति पर चलता आया है, जिसमें वह सीमा विवाद को ठंडे बस्ते में डालकर भारत के साथ व्यापारिक और बहुपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि मतभेदों के बावजूद दो बड़ी एशियाई ताकतें ब्रिक्स के मंच पर एक साथ हैं।

चीन की मजबूरी क्या है? दरअसल, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बढ़ते ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) और वैश्विक घेराबंदी के बीच चीन बेहद दबाव में है। वह ब्रिक्स को एक पश्चिम-विरोधी (Anti-West) मजबूत धड़े के रूप में पेश करना चाहता है, और इसके लिए उसे भारत के साथ की सख्त जरूरत है।

लेकिन भारत चीन के इस चक्रव्यूह को अच्छी तरह समझता है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वैश्विक मंचों पर सहयोग के नाम पर सीमाई संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा।

अंतरराष्ट्रीय जगत की टिकी नजरें

यही वजह है कि नई दिल्ली में हो रही यह दो दिवसीय बैठक सिर्फ एक रूटीन समिट नहीं है। यह भारत-चीन संबंधों के भविष्य का रुख तय करने वाली और चीन की वास्तविक नीयत को उजागर करने वाली साबित होगी। फिलहाल, पूरी दुनिया के रणनीतिकारों की नजरें डोभाल और वांग यी की इस कूटनीतिक बिसात पर टिकी हैं।

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