Foundation Day: साल भर में 365 दिन आते हैं, लेकिन कैलेंडर में 1 नवंबर की तारीख का अपना एक अलग ही राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व है। भारत के नक्शे पर नज़र डालें तो यह तारीख किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि कई राज्यों की पहचान और उनके अस्तित्व की गवाह है। इसके साथ ही वैश्विक इतिहास में भी 1 नवंबर के दिन कई ऐसी बड़ी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने दुनिया की दिशा बदल दी। आइए जानते हैं कि 1 नवंबर का दिन इतिहास में इतना खास क्यों माना जाता है और इस दिन का छत्तीसगढ़ राज्य से क्या गहरा रिश्ता है।
1 नवंबर का दिन इतिहास में क्यों है इतना खास?
भारतीय गणतंत्र के इतिहास में 1 नवंबर की तारीख को "पुनर्गठन और नए उदय की तारीख" कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
- राज्यों का पुनर्गठन (1956):
वर्ष 1956 में इसी दिन भाषाई पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के तहत भारत के कई राज्यों की सीमाएं तय हुई थीं। मध्यप्रदेश, कर्नाटक (तब मैसूर), केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों का गठन या पुनर्गठन 1 नवंबर को ही हुआ था। आगे चलकर 1966 में पंजाब से अलग होकर हरियाणा भी इसी तारीख को अस्तित्व में आया। - फ्रांसीसी शासन से आजादी:
1 नवंबर 1954 को पुडुचेरी, कराइकल, माहे और यानम जैसे क्षेत्र फ्रांसीसी कब्जे से मुक्त होकर औपचारिक रूप से भारतीय संघ में शामिल हुए थे। - गदर आंदोलन की शुरुआत (1913):
भारत की आजादी के पन्नों में दर्ज महान घटना चक्र के तहत इसी दिन स्वतंत्रता सेनानी तारकनाथ दास और उनके साथियों ने अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में 'गदर आंदोलन' की नींव रखी थी। - ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत (1858):
1857 की क्रांति के ठीक एक साल बाद, 1 नवंबर 1858 को ब्रिटिश क्राउन ने भारत का शासन सीधे अपने हाथ में लिया था और ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता समाप्त कर दी गई थी।
छत्तीसगढ़ के लिए 1 नवंबर क्यों है 'वरदान' और गौरव का दिन?
छत्तीसगढ़ की 3 करोड़ से अधिक आबादी के लिए 1 नवंबर का दिन किसी बड़े त्यौहार से कम नहीं है। इसी दिन साल 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ देश के 26वें राज्य के रूप में भारत के मानचित्र पर उभरा था। छत्तीसगढ़ के गठन की वजह कोई भाषाई विवाद नहीं था, बल्कि भौगोलिक दूरी, प्रशासनिक उपेक्षा और यहां की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और खनिज संपदा का सही विकास न हो पाना था। 1 नवंबर 2000 को जब नया राज्य बना, तब से हर साल इस दिन को पूरे प्रदेश में 'राज्योत्सव' के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
किसने की थी इसकी शुरुआत और कैसे साकार हुआ सपना?
छत्तीसगढ़ राज्य की मांग रातों-रात पैदा नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे दशकों पुराना एक लंबा जन-आंदोलन और राजनीतिक इच्छाशक्ति थी।
- आंदोलन के शुरुआती कर्णधार: अलग छत्तीसगढ़ राज्य का विचार सबसे पहले 1920 के दशक में पंडित सुंदरलाल शर्मा के मन में आया था, जिन्हें 'छत्तीसगढ़ का गांधी' भी कहा जाता है। इसके बाद 1965 में आचार्य नरेंद्र दुबे ने 'छत्तीसगढ़ समाज' की स्थापना कर इस मांग को एक संगठित मंच दिया।
आगे चलकर डॉ. ख़ूबचंद बघेल, बैरिस्टर छेदीलाल और विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गजों ने इस आंदोलन की मशाल जलाए रखी। - राजनीतिक इच्छाशक्ति और अटल बिहारी वाजपेयी:
जन-आंदोलन के लंबे दौर के बाद, इस मांग को निर्णायक रूप देने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है। 1990 के दशक में अटल जी ने छत्तीसगढ़ के जनमानस से वादा किया था कि यदि केंद्र में उनकी सरकार बनती है, तो वे छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा देंगे। - संसद की मुहर: अटल जी ने अपना वादा निभाते हुए केंद्र सरकार के माध्यम से 'मध्यप्रदेश पुनर्गठन विधेयक-2000' को संसद से पारित करवाया।
जुलाई और अगस्त 2000 में लोकसभा और राज्यसभा की मंजूरी के बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ एक पूर्ण और स्वतंत्र राज्य बन गया।
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर और जल-जंगल-जमीन की समृद्ध परंपरा वाला यह राज्य आज विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। यही वजह है कि 1 नवंबर का दिन हर छत्तीसगढ़िया के आत्मसम्मान, पहचान और गौरव का प्रतीक बन चुका है।







