Chhattisgarh News: खेतों में लहलहाती धान की फसल को देखकर किसानों के चेहरे पर जो खुशी होनी चाहिए थी, वह अब चिंता की लकीरों में बदल चुकी है। फसल पकने की कगार पर है—कहीं बालियां निकल आई हैं, तो कहीं निकलने की स्थिति में हैं। किसानों ने महीनों पसीना बहाकर फसल खड़ी की, लेकिन अब आवारा पशुओं के झुंड उनकी इस गाढ़ी कमाई पर पानी फेर रहे हैं। सूरज ढलते ही मवेशियों का झुंड खेतों में टूट पड़ता है और धान को चरने के साथ-साथ रौंदकर भारी नुकसान पहुंचा रहा है। ननकट्ठी और उसके आसपास के इलाकों में यह संकट हर बीतते दिन के साथ गहराता जा रहा है।
जाली-तार की फेंसिंग भी साबित हो रही नाकाम
चारों तरफ से खेतों से घिरे ननकट्ठी गांव में सुरक्षा के लिहाज से किसानों ने नाले और नदी की तरफ पोल गाड़कर जालीदार तार (फेंसिंग) लगवाए थे। किसानों को उम्मीद थी कि इससे मवेशियों की घुसपैठ रुक जाएगी। हालांकि, रात में आने वाले मवेशियों के बड़े झुंड के आगे यह फेंसिंग भी बेअसर साबित हो रही है। जानवर फेंसिंग फांदकर या उसे तोड़कर सीधे खेतों में दाखिल हो रहे हैं।
लागत और मेहनत दोनों दांव पर
बुवाई से लेकर खाद, सिंचाई और कीटनाशकों के छिड़काव तक किसान प्रति एकड़ हजारों रूपए लगा चुके हैं। तना छेदक, भूरा माहो और वायरस जैसी बीमारियों की मार से जैसे-तैसे फसल को बचाकर निकाला था, लेकिन अब बेसहारा मवेशी सबसे बड़ी मुसीबत बन गए हैं। खेत में हरहुना धान की बालियां आ चुकी हैं, वहीं सरना और मासूरी जैसी किस्में भी तैयार होने वाली हैं। ऐसे संवेदनशील समय में फसल का यह नुकसान किसानों की कमर तोड़ रहा है।
बुवाई से लेकर खाद, सिंचाई और कीटनाशकों के छिड़काव तक किसान प्रति एकड़ हजारों रूपए लगा चुके हैं। तना छेदक, भूरा माहो और वायरस जैसी बीमारियों की मार से जैसे-तैसे फसल को बचाकर निकाला था, लेकिन अब बेसहारा मवेशी सबसे बड़ी मुसीबत बन गए हैं। खेत में हरहुना धान की बालियां आ चुकी हैं, वहीं सरना और मासूरी जैसी किस्में भी तैयार होने वाली हैं। ऐसे संवेदनशील समय में फसल का यह नुकसान किसानों की कमर तोड़ रहा है।
गौठान व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
क्षेत्र में आवारा पशुओं को संभालने और उनके चारे-पानी के लिए पहले गौठान की व्यवस्था बनाई गई थी। वहां बाकायदा शेड और ट्यूबवेल की सुविधाएं भी मौजूद हैं। बावजूद इसके, देखरेख के अभाव में यह व्यवस्था पूरी तरह सुस्त पड़ चुकी है, जिससे सड़क और गलियों में घूम रहे मवेशियों का रुख सीधे खेतों की ओर हो गया है।अधर में लटकी रखवाली की योजना
फसल की सुरक्षा के लिए ग्राम सभा और स्थानीय किसानों ने मिलकर प्रति एकड़ 200 रूपए का योगदान जुटाकर चौकीदार रखने का प्रस्ताव बनाया था। लेकिन प्रशासनिक ढिलाई और आपसी तालमेल की कमी के कारण यह योजना कागजों से बाहर नहीं निकल पाई। नतीजा यह है कि किसानों को खुद ही टॉर्च और लाठी लेकर रातों को खेतों में पहरा देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

