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भरत तिवारी एनकाउंटर मामला
भरत तिवारी एनकाउंटर मामला
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एनकाउंटर बना सियासी बवंडर : बिलौटी गांव में सर्वदलीय महापंचायत, मां बोलीं- हत्यारों को फांसी हो

बिहार के भोजपुर जिले में भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। भरत तिवारी के पैतृक गांव बिलौटी में आयोजित सर्वदलीय महापंचायत में हजारों लोगों ने एनकाउंटर की न्यायिक जांच और दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग उठाई।

कीर्तिमान न्यूज
25 Jun 2026, 08:11 AM
भोजपुर

बिहार के भोजपुर में हुआ भरत तिवारी एनकाउंटर अब महज़ एक पुलिसिया कार्रवाई नहीं, बल्कि नीतीश-सम्राट सरकार के लिए गले की फांस बन चुका है। इस एनकाउंटर के विरोध में और इंसाफ की मांग को लेकर भरत तिवारी के पैतृक गांव बिलौटी में एक विशाल सर्वदलीय महापंचायत का आयोजन किया गया। महापंचायत में उमड़ी भारी भीड़, ब्राह्मण समाज के मुखर चेहरों, विभिन्न सामाजिक संगठनों और कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने साफ कर दिया कि यह मामला अब एक बड़े जनआंदोलन की शक्ल अख्तियार कर चुका है।

महापंचायत की शुरुआत से पहले ही गांव का माहौल पूरी तरह गरमा गया था। आक्रोशित समर्थकों ने गांव के मुख्य बोर्ड पर "शहीद भरत नगर" लिखकर शासन-प्रशासन को सीधा संदेश दे दिया। स्थानीय लोगों का तर्क है कि भरत तिवारी ने हमेशा गांव के हक और बाढ़ पीड़ितों की भलाई के लिए संघर्ष किया, इसलिए प्रशासन भले ही उसे कुछ समझे, लेकिन जनता के लिए वह शहीद है और गांव का नाम उसी के नाम पर होना चाहिए।

'जब हथियार डाल दिए थे, तो गोली क्यों मारी?'

इस पूरे आंदोलन की बुनियाद इसी एक सुलगते सवाल पर टिकी है। दरअसल, बीती 17 जून को बिहार पुलिस ने एक मुठभेड़ में भरत तिवारी को ढेर करने का दावा किया था। लेकिन परिजनों और ग्रामीणों का आरोप इसके बिल्कुल उलट है। परिजनों का साफ कहना है कि भरत तिवारी ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था और अपने हथियार डाल चुका था। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि आत्मसमर्पण कर चुके व्यक्ति पर गोलियां क्यों बरसाई गईं? क्या यह वाकई एनकाउंटर था या फिर एक सोची-समझी 'साजिश'?

महापंचायत में शामिल लोगों ने पुरज़ोर तरीके से तीन मुख्य मांगें सरकार के सामने रखी हैं:

  1. इस पूरे एनकाउंटर की निष्पक्ष और न्यायिक जांच हो।

  2. एनकाउंटर की स्क्रिप्ट लिखने वाले और इसमें शामिल दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

  3. इलाके के बाढ़ प्रभावित गांवों की बदहाली और उनकी अन्य समस्याओं का तुरंत स्थायी समाधान निकाला जाए।

मां की चीख और 'सिस्टम' का वो विरोधाभास

महापंचायत के दौरान माहौल उस वक्त बेहद गमगीन और भावुक हो गया, जब भरत तिवारी की मां ने रोते हुए न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा, "जिसने भी मेरे बेटे को मारा है, उसे फांसी की सजा मिलनी चाहिए।" मां के इन आंसुओं ने वहां मौजूद भीड़ के गुस्से को और भड़का दिया।

इस पूरे विवाद के केंद्र में पुलिस और प्रशासन का एक बड़ा विरोधाभास (Contradiction) भी है। मरने से पहले भरत तिवारी ने एक फेसबुक लाइव किया था, जिसमें उसने हाथ में हथियार लेकर सीधे सिस्टम को ललकारा था। इसके ठीक बाद, 16 जून को पुलिस ने बाकायदा बयान जारी कर भरत तिवारी को 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' यानी अस्वस्थ घोषित कर दिया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति को पुलिस एक दिन पहले मानसिक बीमार बता रही थी, अगले ही दिन यानी 17 जून को उसे एक 'खूंखार अपराधी' की तरह एनकाउंटर में मार गिराया गया। पुलिस का यही दोहरा रवैया अब उसके गले की हड्डी बन गया है।

नपे डीएसपी, यूपी तक पहुंची आंच

भरत तिवारी की छवि को लेकर समाज दो धड़ों में बंटा नजर आता है। पुलिस रिकॉर्ड और एक वर्ग उसे अपराधी की नजर से देखता है, तो वहीं महापंचायत में उमड़ा जनसैलाब उसे गरीबों का मसीहा और व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाला बागी मान रहा है। जनता के इसी भारी दबाव के आगे आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने इस पूरे एनकाउंटर की 'न्यायिक जांच' के आदेश दे दिए हैं। साथ ही, भरत तिवारी की मां की तहरीर पर जगदीशपुर के तत्कालीन डीएसपी, थाना प्रभारी (SHO) और अन्य संलिप्त पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली गई है। आनन-फानन में जगदीशपुर के डीएसपी राजेश शर्मा को पद से हटाकर मुख्यालय अटैच कर दिया गया है और वहां नए अधिकारी की तैनाती की गई है।

लेकिन गुस्सा सिर्फ भोजपुर तक सीमित नहीं है। इस एनकाउंटर की गूंज बिहार के मोतिहारी से लेकर उत्तर प्रदेश के बहराइच तक सुनाई दे रही है, जहां युवाओं और विभिन्न संगठनों ने कैंडल मार्च निकालकर अपना विरोध दर्ज कराया।

रोहिणी आचार्य से प्रशांत किशोर तक... विपक्ष हमलावर

चुनावी माहौल और राज्य की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति के बीच इस मुद्दे पर सियासत भी चरम पर है। राष्ट्रीय जनता दल की नेता रोहिणी आचार्य से लेकर जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर तक, तमाम विपक्षी नेताओं ने इस एनकाउंटर को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया है और पूरी पारदर्शिता के साथ जांच की मांग की है।

लगातार बढ़ते इस सामाजिक और राजनीतिक दबाव के बीच अब हर किसी की नजरें न्यायिक जांच की रिपोर्ट पर टिकी हैं। सवाल अब महज़ एक मौत का नहीं है, सवाल बिहार की कानून-व्यवस्था, खाकी की साख और न्याय प्रणाली के भरोसे का है। देखना होगा कि जांच में सच बाहर आता है या यह मामला भी फाइलों और राजनीति की भेंट चढ़कर दफन हो जाता है।

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