सरगुजा जिले में धान की खेती के बीच किसानों को खाद की किल्लत और बढ़ी कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। किसानों का आरोप है कि निजी दुकानदार यूरिया और डीएपी खाद को निर्धारित दर से अधिक कीमत पर बेच रहे हैं। कई बार शिकायतों के बाद भी कृषि विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। किसानों का कहना है कि बड़े कारोबारियों पर सख्ती करने के बजाय केवल छोटे फुटकर विक्रेताओं पर कार्रवाई कर मामले को निपटाया जा रहा है।
खाद की कालाबाजारी और अधिक कीमत पर बिक्री करने वाले कारोबारियों के खिलाफ सीधे थाने में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद सरगुजा जिले में अब तक किसी बड़े थोक विक्रेता के खिलाफ एफआईआर की कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे खाद के अवैध कारोबार में शामिल लोगों के हौसले बढ़ने और किसानों को नुकसान पहुंचने की बात कही जा रही है।
रैक प्वाइंट से शुरू होने का आरोप, थोक विक्रेताओं पर सवाल
किसानों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि अंबिकापुर के कुछ थोक खाद विक्रेता रैक प्वाइंट पर पहुंचने वाली खाद को अपने गोदाम तक लाने के बजाय सीधे ग्रामीण क्षेत्रों के फुटकर दुकानदारों को ऊंचे दामों पर बेच देते हैं। इसके बाद यही खाद फुटकर दुकानदार किसानों तक और अधिक कीमत में पहुंचाते हैं। आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा फायदा थोक कारोबारियों को मिल रहा है।
छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई, बड़े कारोबारियों पर नरमी का आरोप
थोक डीलरों के गोदामों की जांच पर उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार खाद के थोक विक्रेताओं के गोदामों का नियमित भौतिक सत्यापन नहीं किया जा रहा है। वहीं पॉस मशीन के जरिए खाद बिक्री की जानकारी की भी प्रभावी जांच नहीं होने से व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। किसानों का कहना है कि बिक्री रिकॉर्ड की निगरानी से खाद की कालाबाजारी पर रोक लगाई जा सकती है।
यूरिया और डीएपी के लिए किसानों से ज्यादा पैसे लेने का आरोप
स्थानीय किसानों का आरोप है कि खाद निर्धारित कीमत से काफी ज्यादा दाम पर बेची जा रही है। शिकायतों के मुताबिक यूरिया की बोरी करीब 600 रुपये तक और डीएपी 2000 से 2500 रुपये प्रति बोरी तक बेची जा रही है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ रहा है।
कृषि विभाग की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
खाद संकट और अधिक कीमत वसूली को लेकर कृषि विभाग के अधिकारियों और फर्टिलाइजर इंस्पेक्टर की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि यदि थोक विक्रेताओं के गोदामों की नियमित जांच, बिक्री रिकॉर्ड की निगरानी और नियम तोड़ने वालों पर एफआईआर जैसी सख्त कार्रवाई की जाए तो खाद की कालाबाजारी को रोका जा सकता है।