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गगनयान क्रू मॉड्यूल टेस्ट
गगनयान क्रू मॉड्यूल टेस्ट
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गगनयान मिशन : अंतरिक्ष से वापसी के तीन सबसे मुश्किल इम्तिहानों में पास हुआ ISRO, सुरक्षित लौटेंगे भारतीय एस्ट्रोनॉट्स

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने गगनयान मिशन के क्रू मॉड्यूल सिस्टम से जुड़े तीन महत्वपूर्ण परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। ये परीक्षण अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी, मॉड्यूल सेपरेशन और पैराशूट सिस्टम की मजबूती से जुड़े थे।

कीर्तिमान न्यूज
13 Jul 2026, 09:31 AM
नई दिल्ली
भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ को लेकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने एक और बड़ी कामयाबी हासिल की है। इसरो ने रविवार को जानकारी दी कि उसने गगनयान के ‘क्रू मॉड्यूल सिस्टम’ से जुड़े तीन बेहद जटिल और बड़े परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। 
ये टेस्ट अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित धरती पर वापसी (Safe Return) से जुड़े थे, जिन्हें इस पूरे मिशन की सबसे संवेदनशील कड़ियों में से एक माना जा रहा था। वैज्ञानिकों का पूरा जोर इस बात पर है कि जब हमारे अंतरिक्ष यात्री स्पेस से लौटकर समंदर में उतरें, तो वे पूरी तरह सुरक्षित रहें। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इसरो ने किन तीन मोर्चों पर यह जंग जीती है। 

पैराशूट भी पानी में सुरक्षित 

मिशन का सबसे पहला और अहम परीक्षण अंतरिक्ष यात्रियों की समंदर में लैंडिंग (स्प्लैशडाउन) से जुड़ा था। जब अंतरिक्ष यात्रियों का केबिन (क्रू मॉड्यूल) समुद्र में गिरेगा, तो लहरों के थपेड़ों के बीच उसका सुरक्षित तैरते रहना सबसे जरूरी है। इसरो ने सुनिश्चित किया है कि पानी में गिरने के बाद न तो केबिन डूबेगा और न ही पलटेगा। इसके पैराशूट भी पानी में सुरक्षित रहेंगे, जिससे रेस्क्यू टीम आसानी से अंतरिक्ष यात्रियों तक पहुंच सकेगी। 

वायुमंडल में प्रवेश से पहले अलग होना जरूरी 

दूसरे टेस्ट में उस सिस्टम को परखा गया जो अंतरिक्ष यात्रियों के रहने वाले 'क्रू मॉड्यूल' और उसे ऊर्जा देने वाले 'सर्विस मॉड्यूल' को आपस में जोड़कर रखता है। जब अंतरिक्ष यान स्पेस से वापस पृथ्वी की तरफ लौटता है, तो सर्विस मॉड्यूल का काम खत्म हो जाता है। धरती पर सिर्फ वही क्रू मॉड्यूल वापस आता है जिसमें अंतरिक्ष यात्री बैठे होते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने से ठीक पहले इन दोनों हिस्सों का अलग होना बेहद जरूरी है। 

पैराशूट और सेफ रिटर्न
टेस्ट के नतीजे शत-प्रतिशत सही 

इसरो ने इस टेस्ट में जांचा कि क्या दोनों मॉड्यूल को जोड़ने वाले सभी तार, नट-बोल्ट और जोड़ बिना किसी रुकावट के, बिल्कुल सटीक समय पर कटकर अलग हो रहे हैं या नहीं। टेस्ट के नतीजे शत-प्रतिशत सही रहे। तीसरे टेस्ट का संबंध केबिन की छत पर लगे एक बेहद मजबूत ढक्कन से है, जिसे तकनीकी भाषा में 'एपेक्स कवर' कहते हैं। दरअसल, जब केबिन बेहद तेज रफ्तार से धरती की तरफ आ रहा होता है, तो उसकी स्पीड को कम करने के लिए बड़े-बड़े पैराशूट खुलते हैं। 

जांच में केबिन की मजबूती खरी 

ये पैराशूट इसी एपेक्स कवर के अंदर सुरक्षित रखे होते हैं। पैराशूट खुलने से ठीक पहले इस भारी-भरकम ढक्कन को एक झटके के साथ हवा में अलग होना पड़ता है। इसरो ने इस परीक्षण में यह आंका कि जब यह ढक्कन अत्यधिक दबाव के बीच झटके से अलग होता है, तो केबिन के मुख्य ढांचे को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचता। जांच में केबिन की मजबूती पूरी तरह खरी उतरी। 

भारत के लिए गर्व की बात 

इन तीनों कामयाबियों के बाद इसरो ने यह साफ कर दिया है कि गगनयान का पूरा सेपरेशन और लैंडिंग सिस्टम अब पूरी तरह भरोसेमंद है। केबिन सही वक्त पर अलग भी होगा, उसके पैराशूट भी सही से खुलेंगे और पानी में गिरने के बाद हमारे अंतरिक्ष यात्री पूरी तरह सुरक्षित तैरते रहेंगे। भारत के इस महत्वाकांक्षी मिशन के लिए यह एक बहुत बड़ी राहत और गर्व की खबर है।
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