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Government Schools Budget: अब ग्राउंड लेवल पर हो रही पाई-पाई का हिसाब किताब, सरकारी स्कूलों को मिले बजट के इस्तेमाल पर कड़ा रुख
Government Schools Budget: सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुविधाओं के लिए जारी होने वाले बजट के सही उपयोग की जांच अब सीधे स्कूल स्तर पर की जाएगी। शिक्षा विभाग ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए शाला प्रमुखों और प्राचार्यों से खर्च के बिल व दस्तावेज जमा करने के निर्देश दिए हैं। जांच में यह देखा जाएगा कि राशि का उपयोग सही मद में हुआ या नहीं और इससे छात्रों को कितना लाभ मिला।
Government Schools Budget: सरकारी स्कूलों में बच्चों की बुनियादी सुविधाओं और छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए हर साल 20 हजार से लेकर 70 हजार रुपये तक का बजट जारी किया जाता है। लेकिन क्या यह पैसा वाकई बच्चों के विकास और उनकी सहूलियतों पर खर्च हो रहा है? इस बार शिक्षा विभाग इसी बात की गहराई से पड़ताल कर रहा है। अब तक स्कूलों के खर्चों का लेखा-जोखा मुख्य रूप से विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) द्वारा भेजी गई रिपोर्टों तक ही सीमित रहता था।
स्कूलों के बिल और दस्तावेज जमा करने के निर्देश
लेकिन इस पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए इस बार विभाग ने सीधे ग्राउंड स्तर से जानकारी जुटाने का फैसला किया है। व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए विकासखंड स्तर पर बैठकों का दौर जारी है, जहाँ सभी शाला प्रमुखों, प्राचार्यों और हेडमास्टरों को खुद उपस्थित होकर अपने-अपने स्कूलों के बिल और दस्तावेज जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।
किन बातों पर रहेगा विशेष फोकस?
जांच अधिकारी मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं:
बजट का पूरा इस्तेमाल: स्कूल को जितनी राशि आवंटित की गई थी, क्या वह पूरी तरह खर्च हुई या नहीं?
सही मद में खर्च: जिस काम (जैसे मरम्मत, स्टेशनरी या स्वच्छता) के लिए फंड जारी हुआ था, पैसा उसी पर लगा या कहीं और?
छात्रों को वास्तविक लाभ: सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह देखा जा रहा है कि इस खर्च से बच्चों की पढ़ाई या स्कूल के माहौल में कोई वास्तविक सुधार आया या नहीं।
इस नई और सख्त व्यवस्था का सीधा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी फंड का एक-एक रुपया कागजी कार्रवाई से निकलकर सीधे बच्चों के काम आ सके।