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सुकमा की आत्मसमर्पित महिलाएं कोसा सिल्क परिधान में रैंप वॉक करती हुईं
सुकमा की आत्मसमर्पित महिलाएं कोसा सिल्क परिधान में रैंप वॉक करती हुईं
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बंदूकों की गूँज से हथकरघा के मंच तक : रायपुर में जब बस्तर की 9 पूर्व नक्सलियों ने रैंप वॉक कर रचा इतिहास

सुकमा की नौ आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस कार्यक्रम के दौरान कोसा सिल्क परिधानों में रैंप वॉक किया। यह छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति और बस्तर में बदलाव की प्रेरक तस्वीर बनी।

कीर्तिमान न्यूज
10 Aug 2026, 03:55 PM
रायपुर
कभी सुदूर बस्तर के घने जंगलों में जिनकी पहचान बंदूकों और खौफ से जुड़ी थी, आज वही हाथ राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और कोसा सिल्क के धागों को सहेज रहे हैं। शुक्रवार को राजधानी रायपुर का पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम एक ऐतिहासिक और भावुक पल का गवाह बना, जब सुकमा जिले की नौ आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर पारंपरिक परिधानों में रैंप वॉक किया।

सफलता की जीवंत तस्वीर

प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन के दौरान आयोजित इस कैटवॉक ने न केवल दर्शकों की तालियाँ बटोरीं, बल्कि छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति की धरातल पर सफलता की एक जीवंत तस्वीर भी पेश की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इन महिलाओं से आत्मीय बातचीत की और मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले की सराहना की। पहली बार रायपुर पहुंचीं इन महिलाओं का हौसला बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इनके उज्ज्वल भविष्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
"भटके हुए युवाओं को समाज की मुख्यधारा में लाकर उन्हें सम्मानजनक जीवन देना ही हमारी प्राथमिकता है। आज इन बहनों का आत्मविश्वास पूरे बस्तर के बदलते स्वरूप को दर्शा रहा है।" — विष्णु देव साय, मुख्यमंत्री
हथकरघा वस्त्रों में मंच पर आत्मविश्वास के साथ कदमताल करना इन महिलाओं के लिए आसान नहीं था। इसके लिए मुंबई से आए पेशेवर फैशन एक्सपर्ट्स ने इन्हें सात दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया था। 
इस ट्रेनिंग के दौरान केवल रैंप वॉक ही नहीं, बल्कि:
  • वेशभूषा और ग्रूमिंग: पारंपरिक परिधानों को गरिमा के साथ कैरी करना।

  • माइक प्रेजेंटेशन: बिना किसी झिझक के सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखना।

  • बॉडी लैंग्वेज: सालों के संकोच और भय को आत्मविश्वास में बदलना।

  • बदलाव का नया दौर

    कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए मिल रहे इस तरह के अवसरों से यह साफ है कि बस्तर में बदलाव की बयार बह रही है। यह आयोजन सिर्फ एक फैशन शो या औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश था जो हिंसा का रास्ता छोड़कर एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य की तलाश में हैं। जो कदम कल तक जंगलों में भटकने को मजबूर थे, आज वे छत्तीसगढ़ की हस्तशिल्प और हथकरघा कला की शान बनकर राष्ट्रीय मंच पर चमक रहे हैं।
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