Hindu Mantras: नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व होता है। इन नौ दिनों में भक्त देवी के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख, शांति व समृद्धि की कामना करते हैं। मां दुर्गा को शक्ति, जगदंबा, महिषासुर मर्दिनी और सर्वमंगला जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। इनमें ‘सर्वमंगला’ नाम का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यही वजह है कि शादी-विवाह, गृहप्रवेश और दूसरे शुभ कार्यों के अवसर पर भी देवी के इस स्वरूप का स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा के अनेक नामों का जाप भक्तों को देवी की कृपा और आशीर्वाद की कामना से जोड़ता है। आइए जानते हैं कि मां दुर्गा को सर्वमंगला क्यों कहा जाता है और इस मंत्र का क्या महत्व है।
सर्वमंगलमांगल्ये मंत्र का क्या है अर्थ ?
मां दुर्गा की स्तुति में एक प्रसिद्ध मंत्र का पाठ किया जाता है, जो दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में वर्णित नारायणी स्तुति का हिस्सा है। मंत्र:
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
इस मंत्र में देवी को समस्त मंगलों में श्रेष्ठ, कल्याणकारी, सभी उद्देश्यों को सिद्ध करने वाली और भक्तों को शरण देने वाली शक्ति के रूप में नमन किया गया है। इसमें देवी को गौरी, त्र्यंबका और नारायणी कहकर भी संबोधित किया गया है।
मां दुर्गा को ‘सर्वमंगला’ क्यों कहा जाता है ?
सर्वमंगला शब्द का अर्थ है सभी प्रकार का मंगल करने वाली देवी। धार्मिक मान्यताओं में मां दुर्गा को ऐसी आदिशक्ति माना गया है, जो संसार के कल्याण और भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी हैं। इसी कारण उन्हें सर्वमंगला के नाम से पुकारा जाता है। यह नाम देवी के उस स्वरूप को दर्शाता है, जो जीवन में शुभता, शांति और सकारात्मकता का प्रतीक है। भक्त मां दुर्गा की आराधना करते समय उनसे परिवार की खुशहाली, कार्यों में सफलता और जीवन की कठिनाइयों से उबरने की प्रार्थना करते हैं।
मंत्र में छिपा है देवी के विभिन्न स्वरूपों का भाव
- शिवे: देवी के कल्याणकारी और शुभ स्वरूप को दर्शाता है।
- सर्वार्थसाधिके: सभी उचित उद्देश्यों की पूर्ति करने वाली शक्ति का भाव व्यक्त करता है।
- शरण्ये: ऐसी देवी, जिनकी शरण में भक्त सुरक्षा और सहारा पाने की कामना करते हैं।
- त्र्यंबके: तीन नेत्रों वाली देवी का संबोधन है।
- गौरी: देवी के सौम्य और उज्ज्वल स्वरूप से जुड़ा नाम है।
- नारायणी: भगवान नारायण की शक्ति के रूप में देवी का स्मरण कराता है।
दुर्गा सप्तशती में कब की गई थी देवी की स्तुति ?
दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में शुंभ और निशुंभ के वध के बाद देवताओं द्वारा देवी की स्तुति का वर्णन मिलता है। इस स्तुति को नारायणी स्तुति के नाम से जाना जाता है। इसमें देवता देवी की महिमा का गुणगान करते हुए उन्हें संसार के कल्याण और रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में नमन करते हैं। इसी स्तुति में शामिल सर्वमंगलमांगल्ये मंत्र का पाठ आज भी देवी उपासना में विशेष स्थान रखता है। नवरात्र सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर भक्त इसका जाप करते हैं।सर्वमंगलमांगल्ये मंत्र का आध्यात्मिक महत्व
इस मंत्र की खासियत यह है कि इसमें देवी की महिमा का वर्णन करने के साथ उनसे कल्याण और कृपा की प्रार्थना भी की जाती है। भक्त इसे श्रद्धा, विश्वास और सकारात्मक भाव के साथ पढ़ते हैं। धार्मिक मान्यता है कि देवी का स्मरण मन को शांति देता है और व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है। नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है। इसके अलावा शादी-विवाह, गृहप्रवेश, यात्रा की शुरुआत, परीक्षा या नई दुकान के उद्घाटन जैसे अवसरों पर भी कई लोग देवी का आशीर्वाद लेने के लिए इसका पाठ करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि मां सर्वमंगला की आराधना से जीवन में शुभता आती है और नए कार्यों की शुरुआत के समय मन में विश्वास बना रहता है। यही कारण है कि देवी के इस नाम और मंत्र का महत्व पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों से भी जुड़ा हुआ है।







