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हॉकी खेलती शिवानी साहू
हॉकी खेलती शिवानी साहू
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इंटरनेशनल हॉकी स्टार : मंडावर की बेटी शिवानी साहू ने जर्मनी में लहराया भारत का परचम, हॉकी से रचा नया इतिहास

दौसा के मंडावर की बेटी शिवानी साहू ने संघर्षों को मात देकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी में अपनी पहचान बनाई है। गांव में बिना सुविधाओं के शुरुआत करने वाली शिवानी आज जर्मनी की महिला रीजनल लीग में खेल रही हैं और भारतीय हॉकी का नाम रोशन कर रही हैं। उनके पिता की मेहनत और बेटी के जुनून की यह कहानी प्रेरणादायक है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 14 Jul 2026, 12:28 PM · अपडेट: 10 Sep 2026, 07:39 AM
दौसा
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
दौसा जिले के छोटे से कस्बे मंडावर की गलियों से निकली एक बेटी आज जर्मनी के हॉकी मैदानों में भारत का नाम रोशन कर रही है। कभी जहां खेलने के लिए न मैदान था और न ही आधुनिक सुविधाएं, वहीं से संघर्ष शुरू करने वाली 23 वर्षीय शिवानी साहू अब अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी बन चुकी हैं। शिवानी साहू वर्तमान में जर्मनी की महिला रीजनल लीग चैंपियनशिप में खेल रही हैं और अपने शानदार प्रदर्शन से अलग पहचान बना रही हैं। 
उनकी कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि मेहनत, संघर्ष और मजबूत इरादों की मिसाल है। शिवानी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मंडावर में ही पूरी की। उस समय गांव में हॉकी खेलने के लिए न कोई मैदान था और न एस्ट्रोटर्फ जैसी सुविधाएं। इसके बावजूद उन्होंने हॉकी को अपना लक्ष्य बनाया और लगातार मेहनत करती रहीं। साल 2013 में उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया, जब जर्मनी की हॉकी कोच एंड्रिया खिलाड़ियों की तलाश में मंडावर के हिम्मत सिंह क्षेत्र पहुंचीं।

2023 में भारतीय टीम में मिली जगह 

उन्होंने आसपास के गांवों में छिपी प्रतिभाओं को तलाशना शुरू किया और इसी दौरान शिवानी की प्रतिभा सामने आई। इसके बाद शिवानी ने जिला और राज्य स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया। वह राजस्थान और महाराष्ट्र की जूनियर व सब-जूनियर टीमों का हिस्सा बनीं। उन्होंने राजस्थान की राष्ट्रीय टीम की कप्तानी भी की। साल 2019 में उनका चयन मुंबई स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में प्रशिक्षण के लिए हुआ, जहां उन्होंने अपने खेल कौशल को और निखारा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हुए शिवानी ने दो कांस्य और एक रजत पदक जीता। वहीं पुणे विश्वविद्यालय की ओर से खेलते हुए भी उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया। साल 2023 में शिवानी को भारतीय हॉकी टीम में जगह मिली। इसके बाद उन्होंने जर्मनी, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और भारत में कई अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिस्सा लिया।

पकौड़ी बेचने वाले पिता ने बेटी का सपना संवारा

भारतीय टीम में वह स्ट्राइकर की भूमिका निभाती हैं और अपनी तेज रफ्तार व आक्रामक खेल शैली के लिए जानी जाती हैं। शिवानी की कामयाबी के पीछे उनके परिवार का संघर्ष भी जुड़ा है। उनके पिता सीताराम साहू मंडावर बस स्टैंड पर पकौड़ी का ठेला लगाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों को कभी रुकने नहीं दिया।
शुरुआती दिनों में हॉकी स्टिक और जूते जैसे महंगे सामान खरीदना परिवार के लिए आसान नहीं था। हॉकी स्टिक की कीमत करीब 20 हजार रुपए और जूते लगभग 10 हजार रुपए तक आते थे। ऐसे समय में कोच की मदद से शिवानी को जरूरी खेल सामग्री मिल पाई। आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। 

जर्मनी में बच्चों को दे रहीं हॉकी प्रशिक्षण

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बाद शिवानी को प्रतियोगिताओं से अच्छी आय मिलने लगी है। इसी मेहनत का असर है कि जो पिता कभी बस स्टैंड पर पकौड़ी बेचते थे, वे अब अपना ऑयल मिल व्यवसाय चला रहे हैं। शिवानी सिर्फ खुद के खेल पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं, बल्कि जर्मनी में बच्चों को हॉकी की ट्रेनिंग भी दे रही हैं। वह सुबह और शाम अपना अभ्यास करती हैं, जबकि दोपहर में करीब 20 से 25 बच्चों को हॉकी सिखाती हैं। उन्होंने बैचलर ऑफ फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई पूरी कर ली है। अब जर्मनी की एक यूनिवर्सिटी ने उन्हें मास्टर इन स्पोर्ट्स साइंस, एक्सरसाइज एंड साइकोलॉजी कोर्स के लिए पूरी छात्रवृत्ति की पेशकश की है। इस कोर्स की फीस और अन्य खर्च विश्वविद्यालय द्वारा वहन किए जाएंगे।

गांव की बेटी से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने तक का सफर

मंडावर की मिट्टी से निकलकर जर्मनी की हॉकी लीग तक पहुंचने का शिवानी साहू का सफर आसान नहीं रहा। संसाधनों की कमी, आर्थिक चुनौतियां और शुरुआती संघर्षों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। आज शिवानी सिर्फ दौसा ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान की बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी कहानी साबित करती है कि प्रतिभा और मेहनत के दम पर गांव से निकलकर भी दुनिया के बड़े मंच तक पहुंचा जा सकता है।
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