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ITAT ने सुनाया बड़ा फैसला
ITAT ने सुनाया बड़ा फैसला
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ITAT का फैसला : नोटबंदी के दौरान बैंक में नकद जमा पर किसान को आयकर विभाग से मिली बड़ी राहत, 

गुजरात के एक किसान ने नोटबंदी (2016) के दौरान अपने बैंक खातों में 11.5 लाख रुपये जमा किए थे। आयकर विभाग ने इसमें से 6.8 लाख रुपये को बिना स्रोत वाली आय मानकर टैक्स और जुर्माना लगा दिया। किसान ने कहा कि यह पैसा उनकी कृषि आय, पुरानी बचत और बैंक से निकाली गई राशि का मिश्रण है, और इसके समर्थन में दस्तावेज भी पेश किए।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 10 May 2026, 11:39 AM · अपडेट: 26 Oct 2026, 03:21 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

साल 2016 में हुई नोटबंदी के दौरान अपने ही बैंक खाते में पैसे जमा करना एक किसान के लिए कानूनी मुसीबत बन गया था, लेकिन लगभग आठ साल बाद न्याय ने उनके पक्ष में रुख किया है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने हाल ही में गुजरात के एक किसान के हक में फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग द्वारा लगाए गए भारी जुर्माने को काफी हद तक खारिज कर दिया है। यह मामला उन लाखों लोगों के लिए एक उदाहरण है जो नोटबंदी के समय अपनी वैध आय के स्रोत साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

क्या था विवाद का मुख्य केंद्र?

यह कहानी सूरत के निवासी दिनेशभाई नागजीभाई विरडिया की है। वित्त वर्ष 2016-17 में जब देश में नोटबंदी लागू हुई, तब दिनेशभाई ने राजकोट जिला सहकारी बैंक में स्थित अपने दो खातों में कुल 11.50 लाख रुपये की नकदी जमा की थी।

आयकर विभाग की नजर इस जमा राशि पर पड़ी और इसे 'संदिग्ध' श्रेणी में डाल दिया गया। विभाग के निर्धारण अधिकारी (AO) ने जांच के बाद तर्क दिया कि किसान केवल 4.70 लाख रुपये का ही वैध स्रोत दिखा पाए हैं। नतीजतन, शेष 6.80 लाख रुपये को आयकर अधिनियम की धारा 69A के तहत 'अघोषित आय' (Unexplained Money) घोषित कर दिया गया और उस पर भारी टैक्स के साथ जुर्माना भी ठोक दिया गया।

कोर्ट में किसान की दलीलें

इनकम टैक्स विभाग के कड़े रुख के बाद दिनेशभाई ने आईटीएटी (राजकोट बेंच) का दरवाजा खटखटाया। उनके वकील ने कोर्ट के सामने पुख्ता सबूत पेश करते हुए बताया कि:

  1. दिनेशभाई के पास 28 बीघा उपजाऊ कृषि भूमि है, जिससे वह नियमित रूप से अच्छी फसल आय प्राप्त करते हैं।

  2. जमा की गई राशि उनकी पुरानी बचत (Opening Cash), कृषि आय, पिछले वेतन और बैंक से समय-समय पर निकाली गई राशि का हिस्सा थी।

  3. साक्ष्य के रूप में भूमि के आधिकारिक दस्तावेज (फॉर्म 7/12, 8A), कैश फ्लो स्टेटमेंट और बैंक ट्रांजेक्शन की प्रतियां पेश की गईं।

ITAT का फैसला: आयकर विभाग की हुई खिंचाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायाधिकरण ने पाया कि आयकर अधिकारियों ने किसान द्वारा दिए गए दस्तावेजों की गहराई से जांच नहीं की थी। ट्रिब्यूनल ने टिप्पणी की कि 28 बीघा जमीन व्यावसायिक खेती के लिए पर्याप्त है और उससे होने वाली आय को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

कोर्ट ने एक संतुलित रास्ता अपनाते हुए निर्देश दिया कि 6.80 लाख रुपये की पूरी रकम को अघोषित आय मानना गलत है। ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि कुल विवादित राशि का केवल 10% (68,000 रुपये) ही आय माना जाए और उसी पर सामान्य दरों से टैक्स लिया जाए। इसके साथ ही, अपील दायर करने में हुई 47 दिनों की देरी को भी किसान की बीमारी के चलते मानवीय आधार पर माफ कर दिया गया।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि यदि करदाता के पास अपनी आय का तार्किक और दस्तावेजी आधार है, तो विभाग बिना ठोस कारण के उसे अघोषित आय करार नहीं दे सकता। किसानों के मामले में उनकी जमीन और नकदी के लेनदेन के पैटर्न को समझना अनिवार्य है।

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