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Bastar Dussehra Bhitar Raini Rath Yatra, Jagdalpur(Image Source: Social Media)
Bastar Dussehra Bhitar Raini Rath Yatra, Jagdalpur(Image Source: Social Media)
जगदलपुर (बस्तर)

Jagdalpur News: बस्तर दशहरा में निभाई गई ‘भीतर रैनी’ की रस्म, आधी रात को कुम्हड़ाकोट ले जाया गया विशाल रथ

Jagdalpur News: बस्तर दशहरा पर्व की करीब 600 साल पुरानी परंपरा ‘भीतर रैनी’ बुधवार देर रात निभाई गई। इस दौरान आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ को परंपरा के अनुसार कुम्हड़ाकोट के जंगल ले जाया गया। गुरुवार को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव नवाखानी की रस्म निभाएंगे, जिसके बाद रथ को वापस मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाएगा।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 22 Oct 2026, 03:43 PM · 3 मिनट पढ़ने का समय
जगदलपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Jagdalpur News: बस्तर में75 दिन तक मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की अनूठी परंपराएं आज भी आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।बुधवार देर रात दशहरा पर्व की प्रमुख रस्म ‘भीतर रैनी’ निभाई गई। इस दौरान 8 चक्का वाले विशालकाय विजय रथ को शहर में घमाया जाता है। परंपरानुसार कुम्हड़ाकोट के जंगल की ओर ले जाया गया। करीब 600 साल पुरानी इस रस्म में बस्तर के आदिवासी ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक भूमिका निभाई। गुरुवार को ‘बाहर रैनी’ की रस्म के तहत रथ को वापस जगदलपुर लाने की तैयारी है।

क्या है बस्तर की ये अनोखी परंपरा

बस्तर दशहरा की ‘भीतर रैनी’ रस्म इस पर्व की सबसे खास परंपराओं में गिनी जाती है। इसमें आदिवासी ग्रामीणों द्वारा हाथों से तैयार किए गए आठ पहियों वाले विशाल रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र विराजमान किया जाता है। इसके बाद रथ को शहर में घुमाया जाता है और आधी रात के समय परंपरा के अनुसार उसे लेकर ग्रामीण कुम्हड़ाकोट के जंगल पहुंचते हैं। इस रस्म के पीछे बस्तर के राजशाही दौर से जुड़ी एक ऐतिहासिक मान्यता है। कहा जाता है कि पुराने समय में राजा से नाराज माड़िया समुदाय के लोगों ने रथ को अपने कब्जे में लेकर एक स्थान पर छिपा दिया था।  

‘बाहर रैनी’ में वापस लौटेगा विजय रथ

परंपरा के अगले चरण में गुरुवार को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव कुम्हड़ाकोट पहुंचेंगे। यहां नाराज ग्रामीणों को मनाने और नवाखानी की रस्म निभाने के बाद विशाल विजय रथ को वापस जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाएगा। रथ की वापसी की इस रस्म को ‘बाहर रैनी’ कहा जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण रथ को खींचते हुए लगभग चार किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। 
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की आदिवासी संस्कृति, सामाजिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत का भी प्रतीक है। ‘भीतर रैनी’ और ‘बाहर रैनी’ जैसी रस्में इस पर्व को देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी स्थानीय समुदाय पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाता है। रथ यात्रा की इन रस्मों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। 
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