SAARC Summit: कभी मालदीव में भारत विरोधी 'इंडिया आउट' अभियान के दम पर सत्ता के शिखर तक पहुंचे राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के तेवर अब क्षेत्रीय कूटनीति के मोर्चे पर बदलते नजर आ रहे हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय में पाकिस्तान का दौरा करने वाले मालदीव के पहले राष्ट्रपति बने मुइज्जू ने अब इस्लामाबाद की जमीन से सार्क (SAARC) शिखर सम्मेलन को जल्द से जल्द बहाल करने की जोरदार वकालत की है। इतना ही नहीं, उन्होंने यहां तक कह दिया है कि मालदीव इस सम्मेलन के आयोजन के लिए अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करने को पूरी तरह तैयार है। मुइज्जू का यह कदम कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है और जानकार मान रहे हैं कि इससे नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक हैं।
क्यों ठंडे बस्ते में गया था सार्क?
दक्षिण एशियाई देशों के इस संगठन का आखिरी औपचारिक शिखर सम्मेलन काफी समय पहले हुआ था। इसके बाद साल 2016 में इस्लामाबाद में इसका अगला बड़ा आयोजन प्रस्तावित था, लेकिन जम्मू-कश्मीर के उरी में सीमा पार से हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत ने इसमें शामिल होने से साफ इंकार कर दिया था, जिसके चलते यह पूरा कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था। तब से लेकर आज तक सार्क की गाड़ी लगभग पटरी से उतरी हुई है। भारत का रुख इस मामले में बहुत स्पष्ट रहा है। नई दिल्ली का मानना है कि सार्क के बैनर तले किसी भी तरह का क्षेत्रीय सहयोग तभी आगे बढ़ सकता है, जब पूरा माहौल आतंकवाद की छाया से मुक्त हो। भारत लगातार यह कहता आया है कि ऐसा अनुकूल और सुरक्षित माहौल तैयार करने की प्राथमिक जिम्मेदारी अकेले पाकिस्तान की है, क्योंकि सीमा पार का आतंकवाद इस पूरे क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है।
मुइज्जू की दलील और मध्यस्थता की पेशकश
इस्लामाबाद में अपनी यात्रा के दौरान मुइज्जू ने इस बात पर जोर दिया कि आज दक्षिण एशिया के तमाम देश अलग-अलग तरह की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं और इनसे निपटने के लिए सार्क सबसे प्रभावी मंच साबित हो सकता है। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, "मेरा पूरा भरोसा है कि हम इस संगठन के जरिए क्षेत्र के सामने खड़ी साझा चुनौतियों का समाधान मिलकर तलाश सकते हैं। सार्क के कामकाज को दोबारा पटरी पर लाने के लिए मालदीव बाकी सभी सदस्य देशों के साथ बातचीत करने को उत्सुक है। आपसी समझ, निरंतर संवाद और भरोसे के बल पर ही हम क्षेत्रीय सहयोग को नई मजबूती दे सकते हैं।" दिलचस्प बात यह है कि यह पहला मौका नहीं है जब मुइज्जू ने सार्क को लेकर इस तरह की पहल की हो। इससे पहले, इस साल मालदीव के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिए गए अपने भाषण में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश तक कर डाली थी, ताकि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत का रास्ता साफ हो सके।
क्या है सार्क और मौजूदा हालात?
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) की नींव साल 1985 में ढाका में रखी गई थी। शुरुआत में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव इसके संस्थापक सदस्य थे। बाद में साल 2006 में हुए 13वें शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान भी इसका हिस्सा बन गया। इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसा एकीकृत और परस्पर जुड़ा हुआ दक्षिण एशिया बनाना था, जहां व्यापार और सांस्कृतिक रिश्ते मजबूत हों। हालांकि, आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के अपने कदम पीछे खींच लेने के बाद से यह संगठन लगभग ठंडे बस्ते में चला गया है। बैठकों के लगातार ठप रहने से पाकिस्तान कई बार खीझ जाहिर कर चुका है और इसके लिए उल्टे भारत पर निशाना साधता रहा है। दूसरी ओर, भारत का स्पष्ट पक्ष है कि पाकिस्तान की आतंकवाद समर्थक नीतियां ही दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की राह का सबसे बड़ा कांटा हैं। हालांकि, मालदीव के अलावा नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भी बीच-बीच में सार्क बैठकों को दोबारा शुरू करने की मांग उठाते रहे हैं, लेकिन जब तक आतंकवाद और कूटनीति के बुनियादी मुद्दों पर आम सहमति नहीं बनती, इस दिशा में कोई ठोस प्रगति होना मुश्किल नजर आता है।







