नीति आयोग का बड़ा खुलासा... भारत में बेरोजगारी से ज्यादा खतरनाक है युवाओं का हुनर से दूर होना
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 15 से 29 वर्ष के करीब 8.7 करोड़ युवा पढ़ाई, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं। इनमें लगभग 88 प्रतिशत घरेलू कामकाज में लगे हैं। आयोग ने महिलाओं और युवाओं के लिए पार्ट-टाइम कोर्स, वित्तीय सहायता, छोटे प्रशिक्षण कार्यक्रम और स्थानीय स्तर पर स्किलिंग उपलब्ध कराने की सिफारिश की है।
भारत में हुनरमंद कार्यबल तैयार करने की राह सिर्फ नौकरियों की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्या इससे कहीं ज्यादा गहरी और चिंताजनक है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ‘रीइमैजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत @2047’ देश के युवा वर्ग को लेकर एक ऐसी सच्चाई सामने लाती है, जो नीति-निर्माताओं के लिए आंखें खोलने वाली है। आयोग के अनुसार, देश में 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न तो किसी स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं, न ही कोई नौकरी कर रहे हैं और न ही किसी तरह का वोकेशनल या टेक्निकल प्रशिक्षण ले रहे हैं।
88% युवा केवल घर के कामकाज में उलझे
तकनीकी भाषा में इस आबादी को NEET (Not in Education, Employment, or Training) कहा जाता है। यह आंकड़ा रिपोर्ट में शामिल कुल लक्षित आबादी का लगभग 11 प्रतिशत है। चौंकाने वाली बात यह है कि NEET श्रेणी में शामिल करीब 88% युवा केवल घर के कामकाज में उलझे हुए हैं। भले ही रिपोर्ट में पुरुषों और महिलाओं के आंकड़े अलग-अलग स्पष्ट न किए गए हों, लेकिन महिलाओं पर आधारित विश्लेषण एक अलग ही तस्वीर बयां करता है। भारत में महिलाओं के लिए कौशल विकास की राह में पारिवारिक जिम्मेदारियां, बच्चों की देखभाल, आने-जाने में सुरक्षा की चिंता और प्रशिक्षण केंद्रों तक सीमित पहुंच सबसे बड़े रोड़े हैं।
केवल 3% महिलाएं ही देश में औपचारिक (फॉर्मल) नौकरियों में हैं।
71% महिलाएं या तो असंगठित क्षेत्र में बेहद कम पारिश्रमिक पर काम कर रही हैं या फिर NEET आबादी का हिस्सा हैं।
68% महिलाएं फुल-टाइम कोर्स के बजाय पार्ट-टाइम (अंशकालिक) स्किल ट्रेनिंग पसंद करती हैं।
30% महिलाएं कम अवधि के (शॉर्ट-टर्म) पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता देती हैं।
स्किलिंग ढांचे को बांटा पांच श्रेणियों में
कई बार बेहद कम उम्र में शादी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण महिलाएं अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। ऐसे में यदि वे बाद में कोई हुनर सीखकर आत्मनिर्भर बनना भी चाहें, तो पूरे दिन के सख्त टाइम-टेबल वाले ट्रेनिंग सेंटर उनके लिए अव्यावहारिक साबित होते हैं। नीति आयोग ने देश के लगभग 60 करोड़ लोगों को ध्यान में रखते हुए स्किलिंग के पूरे ढांचे को पांच श्रेणियों में बांटा है—स्कूली छात्र, उच्च शिक्षा ले रहे युवा, औपचारिक व अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक और महिलाएं। आयोग का साफ मानना है कि कौशल विकास को सिर्फ नौकरी छूटने के बाद का "इलाज" नहीं माना जाना चाहिए। स्किलिंग एक ऐसा मॉडल होना चाहिए जो किसी व्यक्ति के स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा, नौकरी, करियर ब्रेक और फिर से काम पर लौटने की पूरी यात्रा (Life Cycle) का साथ दे।
आज के समय में ट्रेनिंग सेंटर तक न पहुंच पाने की मुख्य वजहें हैं:
आर्थिक तंगी और ट्रेनिंग के दौरान संभावित कमाई का नुकसान।
फ्लेक्सिबल (अपनी सुविधा अनुसार) सीखने के विकल्पों का न होना।
घर या गांव से दूर स्थित ट्रेनिंग सेंटरों तक सुरक्षित परिवहन की कमी।
नीति आयोग ने इस पुरानी धारणा को बदलने की सिफारिश की है कि एक बार पढ़ाई छूट जाने पर व्यक्ति हमेशा के लिए सिस्टम से बाहर हो जाता है। अब 'Non-Linear Learning' (गैर-रेखीय शिक्षा) पर जोर दिया जा रहा है, ताकि लोग जीवन के किसी भी पड़ाव पर दोबारा सीख सकें।
मल्टीपल एंट्री और एग्जिट: युवा अपनी सुविधा अनुसार छोटे कोर्स, माइक्रो-सर्टिफिकेट, स्किल वाउचर और अप्रेंटिसशिप के जरिए दोबारा पढ़ाई या हुनर की दुनिया में लौट सकते हैं।
कमाई के साथ पढ़ाई: एक उदाहरण के तौर पर, यदि कोई महिला पारिवारिक वजहों से स्कूल छोड़ चुकी है, तो वह 'स्किल वाउचर' की मदद से छोटा कोर्स कर सकती है। इसके बाद पार्ट-टाइम काम करते हुए बाद में अपना छोटा-मोटा रोजगार भी शुरू कर सकती है।
सफलता का पैमाना सर्टिफिकेट नहीं
नीति आयोग का मुख्य संदेश यह है कि भारत में समस्या सिर्फ यह नहीं है कि ट्रेनिंग सेंटरों में कितनी सीटें खाली हैं; असली सवाल यह है कि क्या आम नागरिक उस सेंटर तक आसानी से पहुंच सकता है और अपनी घरेलू जिम्मेदारियों के साथ उसे पूरा कर सकता है? अब सफलता का पैमाना यह नहीं होगा कि कितने युवाओं को सर्टिफिकेट बांटे गए, बल्कि यह देखा जाएगा कि क्या प्रशिक्षण पाने वाले व्यक्ति को वास्तव में नौकरी मिली, उसके हुनर में सुधार हुआ और क्या वह अपनी आजीविका को स्थायी बना सका। भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए हमें एक ऐसा लचीला तंत्र बनाना होगा, जहां ड्रॉप-आउट होने का मतलब करियर का अंत न हो।