आचार्य अजय दुबे ने बताया कि देवशयनी एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा के लिए चार महीने तक शयन करते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसे साधना, भक्ति, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का काल माना जाता है। इन चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्यों का आयोजन नहीं किया जाता। मान्यता है कि जब तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब तक शुभ कार्य स्थगित रहते हैं। इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी (देवप्रबोधिनी) एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागृत होते हैं और फिर सभी मांगलिक कार्य दोबारा प्रारंभ हो जाते हैं।
चातुर्मास में संत क्यों नहीं करते यात्रा
यमुना तट पर मां पीतांबरा धाम मंदिर के पुजारी पंडित अजय दुबे ने बताया कि चातुर्मास के दौरान संत-महात्मा एक ही स्थान पर निवास कर तप, ध्यान, जप और सत्संग करते हैं। वर्षा ऋतु होने के कारण इस समय यात्रा करने से बचा जाता है, क्योंकि नदियां और नाले उफान पर रहते हैं तथा रास्तों में अनेक सूक्ष्म जीव-जंतु और कीट-पतंगे उत्पन्न हो जाते हैं। लगातार भ्रमण करने से इन जीवों को अनजाने में हानि पहुंचने की संभावना रहती है। इसी कारण सनातन परंपरा के साथ-साथ जैन धर्म में भी चातुर्मास के दौरान साधु-संत एक स्थान पर रहकर साधना और धर्म प्रचार का कार्य करते हैं।चातुर्मास में शिव का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब इस अवधि में सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी भगवान शिव निभाते हैं। इसलिए चातुर्मास के दौरान भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। देवप्रबोधिनी एकादशी तक भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और उसके बाद पुनः सृष्टि के पालन का दायित्व संभालते हैं। इस दौरान शिव और विष्णु दोनों की उपासना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होने की मान्यता है।
चातुर्मास में करें ये पूजा
पंडित अजय दुबे के अनुसार, चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन भगवान विष्णु और भगवान शिव का विधि-विधान से पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करना और भगवान शिव को बिल्वपत्र चढ़ाना विशेष फलदायी होता है। साथ ही श्रद्धापूर्वक 'ॐ विष्णवे नमः' तथा 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का नियमित जाप करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। इस अवधि में सात्विक जीवनशैली अपनाने, व्रत-उपवास रखने और धार्मिक नियमों का पालन करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।दान-पुण्य का विशेष फल
चातुर्मास को धर्म, सेवा और सत्संग का श्रेष्ठ समय माना गया है। इस दौरान श्रीमद्भागवत कथा, रामायण, गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों का श्रवण एवं अध्ययन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसके साथ ही जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, धन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने से कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता है कि चातुर्मास में किए गए जप, तप, दान और सेवा का फल सामान्य दिनों की तुलना में अधिक मिलता है। इसलिए श्रद्धालुओं को इन चार महीनों में धार्मिक कार्यों, सेवा और ईश्वर भक्ति में अधिक समय देने की सलाह दी जाती है।