The impact of El Niño: भारत में दाल, चीनी, तिलहन और धान जैसी जरूरी फसलों के उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है, इसे अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो माना जा रहा है। आशंका जताई जा रही है कि इस कारण भारत को खाने-पीने की चीजों का आयात करना पड़ सकता है। साथ ही भारत को इस फाइनेंशियल ईयर में एनिमल फीड और एग्रीकल्चर रॉ मटीरियल्स का आयात भी बढ़ाना पड़ सकता है।
सूत्रों के मुताबिक सूखे की वजह से फसलों के उत्पादन में कमी आई है। इस कारण सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। वहीं, इंडस्ट्री भी लागत को काबू में रखने के लिए आयात को आसान बनाने की मांग कर रहा है। चीनी उद्योग को पहले ही रॉ शुगर के आयात के लिए समय-सीमा बढ़ाने की मंजूरी मिल चुकी है।
सूखे से फसल उत्पादन प्रभावित, आयात बढ़ने की आशंका
सूखे और प्रतिकूल मौसम के कारण कई इलाकों में फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इससे बाजार में कृषि उत्पादों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। उद्योग जगत भी उत्पादन लागत को नियंत्रित रखने के लिए आयात संबंधी नियमों में राहत देने की मांग कर रहा है।
सोयाबीन और मूंगफली की फसल पर मौसम की मार
खरीफ सीजन में सोयाबीन और मूंगफली के उत्पादन में गिरावट की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा, आगामी रबी सीजन में सरसों की पैदावार को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं। यदि घरेलू उत्पादन उम्मीद से कम रहता है, तो खाद्य तेल के आयात पर भारत की निर्भरता और बढ़ सकती है।अफ्रीकी देशों से सोयाबीन का आयात बढ़ा
भारत में अफ्रीकी देशों से सोयाबीन का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की जानकारी सामने आई है। पिछले साल अत्यधिक बारिश के कारण सोयाबीन की फसल प्रभावित हुई थी, जिसका असर आपूर्ति पर पड़ा। अब मौजूदा वित्त वर्ष में भी उत्पादन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
क्या महंगे हो सकते हैं पोल्ट्री उत्पाद?
पोल्ट्री उद्योग का कहना है कि सोयाबीन मील और मक्का पशु आहार के प्रमुख घटक हैं, कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दिव्य कुमार गुलाटी के अनुसार, उद्योग ने सरकार से 30 लाख टन सोयाबीन मील के आयात की अनुमति मांगी है। उनका कहना है कि पोल्ट्री फीड में सोयाबीन मील और मक्के की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी होती है।खाद्य तेल के लिए विदेशी बाजारों पर निर्भर है भारत
भारत अपनी कुल खाद्य तेल खपत का लगभग 54 से 56 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। घरेलू उत्पादन और मांग के बीच अंतर के कारण देश को हर साल बड़ी मात्रा में वनस्पति तेल विदेशों से खरीदना पड़ता है।







