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सावन में कांवड़ यात्रा करते शिव भक्त
सावन में कांवड़ यात्रा करते शिव भक्त
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सावन में क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा ? जानिए पहला कांवड़िया कौन था और क्या है पौराणिक मान्यता

सावन में कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा समुद्र मंथन की कथा से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया माना जाता है, हालांकि इसको लेकर अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 30 Jul 2026, 05:53 PM · अपडेट: 12 Sep 2026, 07:21 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही देशभर में भगवान शिव के भक्तों में उत्साह देखने को मिलता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु भगवा वस्त्र पहनकर, पैदल यात्रा करते हुए “हर हर महादेव” के जयकारे लगाते हैं और कंधों पर सजी हुई कांवड़ लेकर निकल पड़ते हैं। कांवड़ यात्रा में भक्त पवित्र नदियों से जल भरकर लाते हैं और सावन में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह यात्रा भगवान शिव के प्रति आस्था, समर्पण और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर सावन में ही कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है और इस परंपरा की शुरुआत किसने की थी?

सावन में ही क्यों की जाती है कांवड़ यात्रा ? 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सावन महीने में कांवड़ यात्रा का संबंध समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल नामक भयंकर विष निकला, तो उससे पूरी सृष्टि संकट में पड़ गई थी। देवताओं और असुरों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से भगवान शिव का शरीर अत्यधिक गर्म होने लगा और उनका कंठ नीला पड़ गया। इसी कारण उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव के शरीर की जलन को शांत करने के लिए देवी-देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था। जल चढ़ाने से शिवजी को विष के प्रभाव से राहत मिली। इसी धार्मिक विश्वास के चलते सावन महीने में भक्त पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। 

पहला कांवड़िया कौन था ? 

कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन कई मान्यताओं के अनुसार भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया माना जाता है।

भगवान परशुराम से जुड़ी मान्यता 

कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने सबसे पहले गढ़मुक्तेश्वर से कांवड़ में गंगाजल भरकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। भगवान परशुराम को शिवजी का परम भक्त माना जाता है। इसी कारण कई लोग उन्हें कांवड़ यात्रा की शुरुआत से जोड़ते हैं। 

भगवान श्रीराम की भी जुड़ी है कथा 

एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में भगवान शिव का अभिषेक किया था। इस कथा को भी कांवड़ परंपरा से जोड़ा जाता है।

रावण और कांवड़ यात्रा की मान्यता 

पौराणिक कथाओं में लंकापति रावण का नाम भी कांवड़ यात्रा से जुड़ा हुआ बताया गया है। मान्यता है कि भगवान शिव के परम भक्त रावण ने समुद्र मंथन के दौरान विष के प्रभाव से परेशान शिवजी को राहत देने के लिए कांवड़ में गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था। 

श्रवण कुमार से जुड़ी कथा 

कांवड़ परंपरा को लेकर एक मान्यता श्रवण कुमार से भी जुड़ी है। कहा जाता है कि श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। यात्रा के दौरान उन्होंने गंगाजल लाकर अपने माता-पिता के लिए धार्मिक अनुष्ठान भी किया था।

आस्था और परंपरा का प्रतीक है कांवड़ यात्रा 

आज कांवड़ यात्रा देश की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में शामिल है। लाखों शिव भक्त हर साल सावन में कठिन पैदल यात्रा कर भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और भगवान शिव के प्रति विश्वास का प्रतीक भी मानी जाती है।
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