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नया खतरा : असंतुलित गर्मी और सर्दी से गर्भ में ही प्रभावित हो रही हमारी आने वाली पीढ़ी की औसत हाईट 

जलवायु परिवर्तन अब मौसम का संकट नहीं, मानव विकास पर भी असर डाल सकता है। नए शोध बताते हैं कि बढ़ती गर्मी और नमी गर्भ में पल रहे बच्चों की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है, जिससे भविष्य में औसत लंबाई घटने का खतरा पैदा हो रहा है।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 02 May 2026, 01:23 PM · अपडेट: 03 Oct 2026, 01:41 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

पिछले डेढ़ सौ वर्षों में इंसानों की औसत लंबाई लगातार बढ़ी है, जिसे बेहतर पोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं और जीवन स्तर का परिणाम माना गया। लेकिन अब वैज्ञानिकों को आशंका है कि यह वृद्धि रुक सकती है और इसके पीछे एक बड़ा कारण बन सकता है जलवायु परिवर्तन। हालिया शोध संकेत देते हैं कि मौसम में बढ़ती गर्मी और नमी बच्चों के शारीरिक विकास को प्रभावित कर सकती है, खासकर गर्भावस्था के दौरान।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन ने इस दिशा में गंभीर संकेत दिए हैं। इस अध्ययन में दक्षिण एशिया के पांच साल से कम उम्र के करीब दो लाख बच्चों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि जिन बच्चों ने गर्भ में रहते हुए अत्यधिक तापमान (35°C से अधिक) और उच्च आर्द्रता का सामना किया, उनकी लंबाई अपेक्षा से लगभग 13% कम पाई गई।

शोध की प्रमुख लेखिका केटी मैकमैहन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान तापमान और नमी में असामान्य उतार-चढ़ाव भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकता है। यह असर जन्म के बाद भी जारी रह सकता है, जिससे बच्चे के शुरुआती पांच वर्षों में उसकी लंबाई और समग्र विकास प्रभावित होता है। ज्ञात हो कि जीवन के पहले पांच वर्ष किसी भी बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

हालांकि, वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि मानव की लंबाई केवल जलवायु पर निर्भर नहीं करती। आनुवंशिकी, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन सभी कारकों पर अप्रत्यक्ष दबाव डाल सकता है, जैसे खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि।

इतिहास भी इस बात का गवाह रहा है कि पर्यावरणीय बदलावों का मानव की लंबाई पर असर पड़ा है। उदाहरण के लिए, लगभग 10,000 वर्ष पहले जब मानव समाज शिकार आधारित जीवन से कृषि आधारित जीवन की ओर बढ़ा, तब शुरुआती दौर में औसत लंबाई में गिरावट दर्ज की गई थी। इसी तरह, यूरोप में 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच आए "लघु शीत युग" के दौरान भी लोगों की औसत लंबाई में कमी आई थी।

ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिचर्ड स्टेकेल के अध्ययन के अनुसार, 17वीं शताब्दी तक उत्तरी यूरोप के पुरुषों की औसत लंबाई लगभग 6.4 सेमी तक घट गई थी। इसका कारण संक्रमण, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों का संयुक्त प्रभाव था।

आधुनिक दौर में भी संकेत मिल रहे हैं कि कुछ विकसित देशों में औसत लंबाई स्थिर हो गई है या हल्की गिरावट आई है। उदाहरण के लिए, नीदरलैंड—जहां दुनिया के सबसे लंबे लोग पाए जाते हैं—वहां हाल के वर्षों में औसत लंबाई में मामूली कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ इसे प्रवासन, खान-पान में बदलाव और बचपन के मोटापे जैसे कारणों से जोड़ते हैं।

इम्पीरियल कॉलेज लंदन की शोधकर्ता डॉ. आंद्रीआ रोड्रिगेज़ मार्टिनेज़ का मानना है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य में मानव विकास पर उसी तरह दबाव डाल सकता है जैसा अतीत में बड़े पर्यावरणीय बदलावों ने डाला था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में लगभग एक अरब बच्चे जलवायु परिवर्तन के कारण "उच्च जोखिम" की श्रेणी में हैं। स्पष्ट है कि यदि बढ़ती गर्मी, असमानता और पोषण संकट पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों का शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है।

  • 🔹 पिछले 150 वर्षों में वैश्विक स्तर पर औसत लंबाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है
  • 🔹 नए शोध के अनुसार, अत्यधिक गर्मी और नमी गर्भ में बच्चों की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है
  • 🔹 35°C से अधिक तापमान और उच्च आर्द्रता के संपर्क में आए बच्चों की लंबाई 13% तक कम पाई गई
  • 🔹 दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में यह खतरा अधिक, जहां पहले से ही गर्म और आर्द्र जलवायु है
  • 🔹 लंबाई केवल आनुवंशिकी नहीं, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर भी निर्भर
  • 🔹 इतिहास में भी जलवायु बदलावों के दौरान मानव की औसत लंबाई में गिरावट देखी गई है
  • 🔹 कुछ विकसित देशों (जैसे नीदरलैंड) में अब लंबाई का ग्राफ स्थिर या गिरता हुआ दिख रहा है
  • 🔹 संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, करीब 1 अरब बच्चे जलवायु परिवर्तन से “उच्च जोखिम” में हैं
  • 🔹 भविष्य में जलवायु परिवर्तन, कुपोषण और असमानता मिलकर मानव विकास को प्रभावित कर सकते हैं 
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