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बीजापुर के साप्ताहिक हाट-बाजार में उमड़ी ग्रामीणों की भीड़
बीजापुर के साप्ताहिक हाट-बाजार में उमड़ी ग्रामीणों की भीड़

लौटी रौनक : नक्सल मुक्त होते ही बदली तस्वीर, बीजापुर के बंद पड़े बाजारों में लौटी चहल-पहल

बीजापुर जिले के उसूर ब्लॉक अंतर्गत पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक हाट-बाजार लगभग 40 वर्षों बाद फिर से गुलजार होने लगे हैं। माओवादी प्रभाव और भय के कारण लंबे समय तक बंद पड़े ये बाजार अब नक्सल मुक्त वातावरण में ग्रामीणों, आदिवासियों और व्यापारियों की चहल-पहल से जीवंत हो उठे हैं। वनोपज आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था को इससे नई गति मिल रही है। बाजारों के पुनर्जीवित होने से छोटे व्यापारियों, किसानों और वनोपज संग्राहकों को सीधा लाभ मिल रहा है, वहीं क्षेत्र में शांति, विकास और आत्मनिर्भरता की नई तस्वीर भी उभरकर सामने आ रही है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 18 May 2026, 11:40 AM · अपडेट: 30 Oct 2026, 12:29 AM
रायपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
कभी माओवाद के आतंक और भय के कारण वीरान पड़े बीजापुर जिले के सुदूर वनांचल अब विकास, विश्वास और नई उम्मीदों की मिसाल बनते जा रहे हैं। नक्सलवाद से मुक्ति के बाद जिले के अंदरूनी क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन तेजी से पटरी पर लौट रहा है। इसका सबसे जीवंत उदाहरण उसूर ब्लॉक के आवापल्ली क्षेत्र अंतर्गत पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक बाजार हैं, जहां लगभग चार दशकों बाद फिर से रौनक लौट आई है।
एक समय ऐसा था जब इन क्षेत्रों में भय और असुरक्षा के कारण ग्रामीणों की आवाजाही लगभग बंद हो चुकी थी। माओवाद के प्रभाव के चलते यहां के पारंपरिक साप्ताहिक बाजार पूरी तरह ठप पड़ गए थे। लेकिन अब नक्सल मुक्त वातावरण बनने के बाद बाजारों में फिर से चहल-पहल दिखाई देने लगी है। ग्रामीण, व्यापारी और आदिवासी बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं, जिससे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिली है। बस्तर अंचल केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि वनोपज आधारित समृद्ध परंपराओं के लिए भी देशभर में जाना जाता है। यहां के साप्ताहिक हाट-बाजार स्थानीय संस्कृति, सामाजिक जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

आय का प्रमुख स्रोत

बीजापुर जिला चारों ओर से घने वनांचलों से घिरा हुआ है, जहां आदिवासी समुदाय का जीवन जंगल और वनोपज पर आधारित है। इमली, महुआ, टोरा, चिरौंजी, तेंदू जैसी बहुमूल्य वनोपज यहां के लोगों की आय का प्रमुख स्रोत हैं। ग्रामीण इन उत्पादों का संग्रहण कर साप्ताहिक बाजारों में विक्रय करते हैं तथा बदले में दैनिक जरूरत की वस्तुएं खरीदते हैं। इन बाजारों का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामुदायिक जीवन का भी केंद्र होते हैं।

चार दशकों तक सन्नाटा

उसूर ब्लॉक के पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक बाजार कभी आसपास के अनेक गांवों की आर्थिक धुरी हुआ करते थे। लेकिन माओवादी गतिविधियों और असुरक्षा के माहौल ने इन बाजारों की रौनक छीन ली। धीरे-धीरे यहां व्यापार बंद हो गया और क्षेत्र आर्थिक रूप से प्रभावित होने लगा। अब जब क्षेत्र पूरी तरह नक्सल मुक्त हो चुका है, तब वर्षों से बंद पड़े बाजारों में फिर से दुकानें सजने लगी हैं। ग्रामीण दूर-दराज के गांवों से बाजार पहुंच रहे हैं। महिलाएं वनोपज लेकर आ रही हैं तो छोटे व्यापारी दैनिक उपयोग की सामग्री बेचने पहुंच रहे हैं। बाजारों में फिर से स्थानीय बोली, पारंपरिक वेशभूषा और आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक दिखाई देने लगी है।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

पुनः प्रारंभ हुए ये साप्ताहिक बाजार स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए आर्थिक संबल बनकर उभर रहे हैं। ग्रामीणों को अब अपने उत्पाद बेचने के लिए दूरस्थ क्षेत्रों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है। इससे समय और संसाधनों की बचत हो रही है तथा स्थानीय स्तर पर आय के नए अवसर भी बढ़ रहे हैं। बाजारों के पुनर्जीवित होने से छोटे व्यापारियों, किसानों और वनोपज संग्राहकों को सीधा लाभ मिल रहा है। साथ ही क्षेत्र में परिवहन, छोटे व्यवसाय और अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिल रही है।

शांति और विकास का नया प्रतीक

बीजापुर में लौटती बाजार संस्कृति यह दर्शाती है कि शांति स्थापित होने पर विकास की संभावनाएं किस प्रकार तेजी से आकार लेती हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार जैसी मूलभूत सुविधाओं के विस्तार से अब वनांचल के गांव भी मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के बाजारों में लौटती रौनक केवल व्यापार की वापसी नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और समृद्ध भविष्य की वापसी का प्रतीक है। यह बदलता हुआ बीजापुर अब संघर्ष की नहीं, बल्कि विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है।
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