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कोहिनूर : ममदानी के बयान से फिर गरमाया विवाद कि क्या सच में लूटकर ले गया था ब्रिटेन

ज़ोहरान ममदानी के बयान के बाद कोहिनूर हीरा फिर सुर्खियों में है। 1849 में महाराजा दलीप सिंह से जबरन संधि कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे हासिल किया। इससे पहले यह मुग़ल, फ़ारसी और सिख शासकों के बीच सत्ता के साथ बदलता रहा।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 02 May 2026, 12:37 PM · अपडेट: 21 May 2026, 02:40 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

एक बार फिर दुनिया के सबसे चर्चित हीरे ‘कोहिनूर’ पर बहस तेज हो गई है। इस बार चर्चा की वजह बने हैं ज़ोहरान ममदानी, जिनके बयान ने औपनिवेशिक दौर की उस कहानी को फिर सामने ला दिया है, जिसे भारत लंबे समय से “लूट” मानता रहा है।

इतिहास के पन्ने पलटें तो 29 मार्च 1849 का दिन निर्णायक साबित होता है। लाहौर किले के शीश महल में महज 10 साल के महाराजा दलीप सिंह से एक ऐसी संधि पर हस्ताक्षर करवाए गए, जिसने न सिर्फ सिख साम्राज्य का अंत किया, बल्कि कोहिनूर हीरे को भी ब्रिटिश कब्जे में पहुंचा दिया। यह संधि ईस्ट इंडिया कंपनी की शर्तों पर हुई थी, जिसमें कोहिनूर को ब्रिटेन की महारानी को सौंपना अनिवार्य था।

कोहिनूर की कहानी इससे भी कहीं पुरानी और रक्तरंजित रही है। माना जाता है कि यह हीरा पहले दक्षिण भारत से मुग़ल खजाने में पहुंचा। 1739 में फ़ारसी शासक नादिर शाह ने करनाल का युद्ध में मुग़लों को हराकर दिल्ली लूट ली और कोहिनूर अपने साथ ईरान ले गया।

नादिर शाह की हत्या के बाद यह हीरा अफगान शासकों के पास गया और अंततः महाराजा रणजीत सिंह के हाथों पंजाब पहुंचा। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य कमजोर पड़ा और द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध में हार के साथ ही कोहिनूर अंग्रेजों के कब्जे में चला गया।

इसके बाद 1850 में यह हीरा इंग्लैंड भेजा गया और क्वीन विक्टोरिया को सौंप दिया गया। आज यह ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है, लेकिन इसकी वापसी को लेकर विवाद अब भी कायम है।

भारत समेत कई देशों का मानना है कि कोहिनूर एक “औपनिवेशिक लूट” का प्रतीक है, जिसे वापस किया जाना चाहिए। ममदानी के बयान ने इस बहस को एक बार फिर वैश्विक मंच पर ला खड़ा किया है।

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