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शौचालय निर्माण में घोटाला
शौचालय निर्माण में घोटाला
मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर

सरकारी योजनाओं की बलि : कागजों पर बना शौचालय और मकान, खौफ के साए में जी रही माझी जनजाति

मैनपाट (छत्तीसगढ़) के माझी जनजाति क्षेत्र में स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया गया है। कई जगह शौचालय या तो बने ही नहीं या बहुत घटिया गुणवत्ता के हैं, जिससे ग्रामीणों को आज भी खुले में शौच जाना पड़ता है और खासकर महिलाओं को बरसात में भारी असुरक्षा झेलनी पड़ती है। इसी तरह प्रधानमंत्री आवास योजना में भी कई घर कागज़ों पर पूरे दिखाए गए, जबकि वास्तविकता में लोग अब भी झोपड़ियों में रह रहे हैं। कुछ मामलों में राशि बिचौलियों तक पहुँचने और प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप भी लगाए गए हैं।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 06 May 2026, 01:23 PM · अपडेट: 20 Oct 2026, 02:37 AM
सरगुजा
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

छत्तीसगढ़ के शिमला कहे जाने वाले मैनपाट की हसीन वादियों के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। यहाँ के कमलेश्वरपुर जनपद पंचायत क्षेत्र में रहने वाली माझी जनजाति के हज़ारों लोग आज भी आदिम युग जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस 'स्वच्छ भारत मिशन' और 'प्रधानमंत्री आवास योजना' का ढिंढोरा पूरे देश में पीटा जा रहा है, उसकी ज़मीनी हकीकत मैनपाट में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है।

शौचालय घोटाला: भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी 'दीवारें'

मैनपाट की 25 से अधिक ग्राम पंचायतों में माझी जनजाति की लगभग 30,000 से अधिक आबादी निवास करती है। सरकारी आंकड़ों में यहाँ शौचालय निर्माण के लक्ष्य पूरे दिखाए गए हैं, लेकिन हकीकत में 90% से अधिक परिवार आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।

  • घटिया निर्माण: पंचायतों द्वारा जो शौचालय बनवाए गए, उनमें इतनी घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया कि वे उपयोग से पहले ही जर्जर हो गए।

  • कागजी शौचालय: कई गांवों में तो शौचालय धरातल पर उतरे ही नहीं; उनका निर्माण सिर्फ फाइलों में दिखाकर पूरी राशि डकार ली गई।

  • टूटे गेट और अधूरी छतें: कुनिया ग्राम पंचायत की महिलाओं का कहना है कि प्रशासन ने लोहे के जो दरवाजे लगवाए, वे चंद दिनों में ही जंग लगकर टूट गए। न पानी की व्यवस्था की गई और न ही गड्ढों का मानक ध्यान रखा गया।

खौफ की रातें: सांपों का डर और महिलाओं की सुरक्षा

बरसात का मौसम यहाँ की महिलाओं के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। शाम ढलते ही महिलाओं को खेतों या जंगलों की ओर जाना पड़ता है।

"बरसात में एक हाथ में छाता और दूसरे में टॉर्च लेकर डर-डर कर जंगल जाना पड़ता है। कई बार जहरीले सांपों और जंगली जानवरों से सामना हो चुका है। कई महिलाओं और बच्चों ने अपनी जान तक गँवा दी है।" - रम्मती, ग्रामीण महिला

अब स्थिति यह है कि अपनी सुरक्षा के लिए कई परिवार खुद के मामूली संसाधनों और मेहनत की कमाई से उन सरकारी शौचालयों की मरम्मत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें सरकार को मुफ्त में देना था।

छत के नाम पर सिर्फ छल: घास-फूस के मकान और 'कागजी महल'

शौचालय ही नहीं, प्रधानमंत्री आवास योजना में भी यहाँ करोड़ों का खेल हुआ है। मैनपाट जनपद पंचायत में लगभग 1000 से अधिक मकान ऐसे हैं जो कागजों पर तो 'पूर्ण' हैं, लेकिन हकीकत में वहां आज भी माझी परिवार घास-फूस की झोपड़ियों में रह रहे हैं।

कैसे हुआ खेल?

जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मकानों की किश्त हितग्राहियों के बजाय बिचौलियों और दलालों के खातों में ट्रांसफर कर दी गई। इस सिंडिकेट में जनपद पंचायत के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत की बात भी सामने आई है। बावजूद इसके, दोषियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है और गरीब परिवार आज भी पक्की छत के लिए भटक रहे हैं।

जवाबदेही की दरकार

माझी जनजाति के लोग आज दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ भ्रष्टाचार ने उनके हक के पैसे छीन लिए, तो दूसरी तरफ प्रकृति और असुरक्षा का खतरा उनके सिर पर मंडरा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन इन "कागजी निर्माणों" की उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषियों को जेल भेजेगा? या फिर माझी जनजाति इसी तरह भ्रष्टाचार की बारिश में भीगने और जहरीले सांपों के साए में जीने को मजबूर रहेगी?

सरकारी तंत्र की यह उदासीनता न केवल एक समुदाय के साथ अन्याय है, बल्कि 'अंत्योदय' के संकल्प पर भी एक गहरा प्रहार है।

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