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नकल के आरोप में परीक्षा रद्द करने का मामला
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नकल के आरोप में पूरे सेमेस्टर की परीक्षा रद्द करने का मामला, हाई कोर्ट ने केंद्रीय विश्वविद्यालय को सजा की समीक्षा करने के दिए निर्देश

गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की MSW छात्रा कनक सोनी के हाथ पर कथित अक्षर मिलने के बाद उसका पूरा सेकंड सेमेस्टर निरस्त कर दिया गया था। छात्रा ने इस कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने कहा कि सामग्री का मौजूद होना और उसका परीक्षा में वास्तविक इस्तेमाल होना अलग-अलग बातें हैं।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 21 Aug 2026, 12:32 PM · अपडेट: 04 Oct 2026, 04:26 AM
बिलासपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमएसडब्ल्यू (मास्टर ऑफ सोशल वर्क) की छात्रा के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अहम रुख अपनाया है। छात्रा के हाथ पर मिले कथित निशानों को अनुचित साधन का इस्तेमाल मानकर उसका पूरा सेकंड सेमेस्टर निरस्त करने के फैसले पर हाई कोर्ट ने पुनर्विचार करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने विश्वविद्यालय के सक्षम अपीलीय प्राधिकारी से कहा है कि वे छात्रा की सजा पर दोबारा विचार करें और मामले के सभी पक्षों को देखने के बाद एक स्पष्ट व तर्कपूर्ण आदेश जारी करें। बिलासपुर निवासी कनक सोनी विश्वविद्यालय से एमएसडब्ल्यू द्वितीय सेमेस्टर की पढ़ाई कर रही हैं। 

छात्रा ने खटखटाया हाई कोर्ट का दरवाजा

6 जुलाई 2026 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने नकल के एक मामले में छात्रा को श्रेणी 9(आई) (सी) का दोषी माना। इसके तहत उसकी सेकंड सेमेस्टर की पूरी परीक्षा निरस्त कर दी गई और उसे अगले शैक्षणिक सत्र में दोबारा परीक्षा देने का फरमान सुनाया गया। छात्रा ने जब इस फैसले के खिलाफ अपील की, तो 3 अगस्त को उसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद छात्रा ने न्याय के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

अक्षरों का परीक्षा में नहीं किया गया इस्तेमाल

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि उसके हाथ पर केवल याददाश्त के तौर पर कुछ अलग-अलग अक्षर लिखे थे। इनका उपयोग परीक्षा के दौरान उत्तर पुस्तिका में लिखने के लिए नहीं किया गया था। याचिका में कहा गया कि विश्वविद्यालय ने अपने आदेश में यह कहीं स्पष्ट नहीं किया कि हाथ पर लिखे अक्षरों का वास्तव में परीक्षा में इस्तेमाल हुआ था या नहीं। इसके बावजूद उसे कड़ी श्रेणी में रखते हुए कठोर सजा दे दी गई। 

परीक्षा रद्द करना बेहद गंभीर कदम 

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि पूरे सेमेस्टर की परीक्षा रद्द कर देना एक बेहद गंभीर कदम है, जिससे किसी छात्र का पूरा भविष्य और पढ़ाई प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में यह देखना बहुत जरूरी है कि कथित misconduct (गलत आचरण) का स्वरूप क्या था, उसके प्रमाण क्या हैं और क्या सजा अपराध के अनुपात में सही है। 

छात्रा के पास अपील करने का विकल्प मौजूद 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाथ में कोई सामग्री मौजूद होना और परीक्षा में उसका वास्तविक इस्तेमाल होना—ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि छात्रा के पास केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 की धारा 35 के तहत अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील करने का वैधानिक विकल्प मौजूद है।

इस पर हाई कोर्ट ने मामले का सीधे निपटारा करने के बजाय छात्रा को इस वैधानिक मार्ग का उपयोग करने का निर्देश दिया:

  • 7 दिन में अपील: छात्रा को 7 कार्यदिवस के भीतर अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपनी अपील प्रस्तुत करनी होगी।

  • 15 दिन में फैसला: अपील मिलने के बाद सक्षम प्राधिकारी को 15 दिनों के अंदर इस पर अपना अंतिम और तर्कसंगत फैसला देना होगा।

अपीलीय समिति को इन मुख्य बिंदुओं पर करना होगा विचार:

  • छात्रा को श्रेणी 9(आई)(सी) में वर्गीकृत करने का वास्तविक तथ्यात्मक और साक्ष्यगत आधार क्या है?

  • क्या हाथ पर मिले निशानों का उपयोग परीक्षा में उत्तर लिखने के लिए वास्तव में हुआ था?

  • छात्रा की सफाई और विभागाध्यक्ष (HOD) की 10 जुलाई की सिफारिशों का क्या प्रभाव पड़ता है?

  • क्या संबंधित अनुचित साधन नियमों (UFM Rules) के तहत दी गई सजा आनुपातिक और न्यायसंगत है?

इन दिशा-निर्देशों को जारी करने के साथ ही उच्च न्यायालय ने इस याचिका का अंतिम निराकरण कर दिया।

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