क्या था पूरा विवाद?
यह पूरा मामला सुवन यदुवंशी नाम के एक छात्र से जुड़ा है, जिन्होंने शिवाजी कॉलेज में बीए (ऑनर्स) इतिहास में प्रोविजनल एडमिशन मिलने के बाद रद्द किए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी थी।
छात्र का बैकग्राउंड: छात्र ने साल 2021 में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स (PCM) से 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी।
विषय परिवर्तन: सत्र 2025-26 के लिए छात्र ने CUET-UG में अंग्रेजी, भूगोल, इतिहास और राजनीति विज्ञान विषयों की परीक्षा दी।
रद्द हुआ दाखिला: अंक बेहतर होने के चलते CW (सशस्त्र बल) कोटा के तहत शिवाजी कॉलेज में सीट तो मिल गई, लेकिन 17 अगस्त 2025 को यूनिवर्सिटी ने सब्जेक्ट-मैपिंग का नियम पूरा न होने की वजह से उनका आवंटन रद्द कर दिया।
दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
कोर्ट ने छात्र की याचिका खारिज करते हुए कई कड़े और स्पष्ट बिंदु रखे:
पात्रता बनाम मेरिट: सीयूईटी की मेरिट रैंकिंग केवल उन्हीं छात्रों के बीच चयन प्रक्रिया का माध्यम है जो पहले से अनिवार्य शर्तें पूरी करते हों। मेरिट लिस्ट किसी यूनिवर्सिटी के दाखिला नियमों को दरकिनार नहीं कर सकती।
संविधान और NEP पर रुख: छात्र ने डीयू के 'बुलेटिन ऑफ इंफॉर्मेशन' (क्लॉज-5) को अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था और इसे नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के खिलाफ ठहराया था। कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
शैक्षणिक संस्थानों का अधिकार: अदालत ने स्पष्ट किया कि एजुकेशन पॉलिसी और एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया तय करना विशेषज्ञों का काम है। इसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।
हाई कोर्ट ने माना कि डीयू का यह नियम उच्च शिक्षा के स्तर को बनाए रखने और फर्जी/छाया स्कूलों (Shadow Schools) के जरिए अचानक विषय बदलने जैसी गड़बड़ियों पर लगाम लगाने के लिए पूरी तरह तर्कसंगत और जरूरी है।






