Education News CG: निजी स्कूलों की तर्ज पर वनांचल और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को मुफ़्त व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के उद्देश्य से शुरू की गई सरकार की महत्वाकांक्षी स्वामी आत्मानंद स्कूल योजना कोरबा जिले में सरकारी ढर्रे की भेंट चढ़ती दिख रही है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए तीन महीने का वक्त बीत चुका है, लेकिन जिले के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में शिक्षकों का अकाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। हालत यह है कि आगामी 21 सितंबर से त्रैमासिक परीक्षाएं प्रस्तावित हैं, और बच्चे बिना विषय अध्यापकों के ही परीक्षा हॉल में बैठने को मजबूर होंगे। जिले में कुल 65 स्वामी आत्मानंद स्कूल संचालित हैं, जिनमें से 15 अंग्रेजी माध्यम के हैं। इनमें कला, वाणिज्य और विज्ञान जैसे मुख्य विषयों के करीब 79 मानदेय (गेस्ट) शिक्षकों के पद पूरी तरह से खाली पड़े हैं।
बिना पढ़ाई बच्चे परीक्षा में लिखेंगे क्या
हालांकि, शिक्षण संचालनालय की ओर से इन पदों को भरने के लिए आवेदन मंगाने की प्रक्रिया शुरू तो कर दी गई है, लेकिन पूरी भर्ती प्रक्रिया में कम से कम एक महीने का समय लगने का अनुमान है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बिना पढ़ाई के बच्चे परीक्षा में क्या लिखेंगे? शिक्षकों की कमी को लेकर कोरबा में छात्रों का गुस्सा कोई नया नहीं है। पिछले साल पसान हाईस्कूल के विद्यार्थियों ने कक्षाओं में शिक्षक न होने से नाराज होकर मुख्य मार्ग पर चक्काजाम तक कर दिया था। भारी विरोध के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया।
बेहतर भविष्य के लिए कराया दाखिला पर अब साल बर्बाद होने का डर
अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की आस में आत्मानंद स्कूल में दाखिल तो करा दिया, लेकिन अब पढ़ाई न होने से उनका साल बर्बाद होने की कगार पर है। जिले के सरकारी शिक्षा ढांचे का एक और स्याह पहलू अटैचमेंट (संबद्धीकरण) का खेल है। कोरबा में संचालित 186 आश्रमों और छात्रावासों में अधीक्षकों के करीब 40 पद खाली हैं। इस प्रशासनिक कमी को छुपाने के लिए शिक्षा विभाग ने उन स्कूलों से शिक्षकों को उठाकर हॉस्टलों में अटैच कर दिया है, जो पहले से ही शिक्षक विहीन या एकल-शिक्षकीय थे।
रिटायर्ड पदों पर भर्ती प्रक्रिया अटकी
इसका सीधा असर यह हुआ कि कई प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय अब सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिन्हें एक साथ दो से तीन कक्षाओं के बच्चों को संभालना पड़ रहा है। जिले में हर साल औसतन 50 से 60 शिक्षक अपनी सेवाएं पूरी कर सेवानिवृत्त (रिटायर) हो रहे हैं। रिटायर्ड पदों पर नियमित भर्ती प्रक्रिया लंबे समय से अटकी हुई है। विभाग मानदेय शिक्षकों के सहारे काम चलाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन वह व्यवस्था भी समय पर पूरी नहीं हो पाती। दूसरी तरफ, B.Ed और D.El.Ed की डिग्रियां हाथ में लिए क्षेत्र के हजारों बेरोजगार युवा नियमित भर्ती का इंतजार करते-करते निराश हो चुके हैं।
असर पर बच्चों के शैक्षणिक परिणामों पर
शिक्षकों के टोटे का सीधा असर अब बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन और परीक्षा परिणामों पर दिखने लगा है। इस वर्ष जारी हुए छत्तीसगढ़ बोर्ड की हाईस्कूल (10वीं) और हायर सेकंडरी (12वीं) के नतीजों में कोरबा जिले का एक भी छात्र राज्य की 'टॉप-10' मेरिट सूची में अपनी जगह नहीं बना पाया। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक ही शिक्षक पर कई विषयों और कक्षाओं का बोझ डाल दिया जाएगा, तो वह बच्चों की बुनियाद मजबूत करने में असमर्थ रहेगा। यही वजह है कि जिले के बच्चों का आत्मविश्वास और प्रदर्शन लगातार गिर रहा है।पदस्थापना स्थल पर प्रभार लेने से इनकार
शिक्षकों का संतुलन बनाने के लिए विभाग ने पिछले दिनों युक्तियुक्तकरण (Rationalization) की नीति अपनाई थी। इसके तहत अतिशेष शिक्षकों का तबादला शिक्षक-विहीन या कम शिक्षक वाले स्कूलों में किया गया था। हालांकि, इनमें से पांच शिक्षकों ने नए पदस्थापना स्थल पर प्रभार लेने से इनकार कर दिया। विभाग ने जब वेतन रोकने और नोटिस की कार्रवाई की, तो वे मामला लेकर अदालत चले गए। फिलहाल, स्टे (Stay Order) मिलने के कारण संबंधित स्कूलों में पद खाली के खाली ही पड़े हैं।
अधिकारी का पक्ष:
"जिले के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में रिक्त पदों की पूरी जानकारी राज्य शासन को भेजी जा चुकी है। शिक्षण संचालनालय स्तर से भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जब तक नए शिक्षक नहीं आ जाते, तब तक संबंधित स्कूलों में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत पढ़ाई संचालित कराई जा रही है।" — तामेश्वर उपाध्याय, जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ), कोरबा

