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फसलों पर सूखे का खतरा
फसलों पर सूखे का खतरा
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अल-नीनो सक्रिय : मानसून पर बड़ा खतरा, भारत में सूखे जैसे हालात की आशंका

अल-नीनो के सक्रिय होने से भारत में मानसून के कमजोर और असमान रहने की आशंका बढ़ गई है। इससे खासकर मध्य, उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी भारत में बारिश की कमी या अनियमित वर्षा हो सकती है। इसका सीधा असर खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, सोयाबीन और कपास पर पड़ सकता है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 16 Jun 2026, 01:38 PM · अपडेट: 07 Oct 2026, 10:28 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
मौसम के मोर्चे पर एक बड़ी और चिंताजनक खबर आ रही है। दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करने वाला अल-नीनो सिस्टम अब सक्रिय हो गया है। इसका सीधा असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ने वाला है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO के मुताबिक, अल-नीनो का असर इस साल अगस्त से लेकर नवंबर तक रहने की संभावना है।
 भारत में जून से सितंबर के दौरान किसानों को खरीफ फसलों के लिए मानसूनी बारिश की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे में अल-नीनो के सक्रिय होने से देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात बनने की आशंका बढ़ गई है।

क्या होता है अल-नीनो और यह कैसे मानसून को बिगाड़ता है?

सरल शब्दों में समझें तो अल-नीनो एक ऐसी प्राकृतिक घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी की सतह सामान्य से बहुत अधिक गर्म हो जाती है। जब यह समंदर का पानी गर्म होता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की हवाओं और बादलों पर पड़ता है। भारतीय मानसून मुख्य रूप से समुद्र से नमी खींचकर जमीन पर बारिश लाता है। लेकिन अल-नीनो के सक्रिय होने से यह नमी और हवा का रास्ता बदल जाता है। नतीजा यह होता है कि बादल कम बनते हैं और बारिश के बीच लंबा अंतर आ जाता है, जिसे ड्राई स्पेल कहा जाता है। अमेरिकी स्पेस और मौसम एजेंसी नोआ (NOAA) के क्लाइमेट प्रीडिक्शन सेंटर ने भी एडवाइजरी जारी कर बताया है कि इस समय समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 0.7 डिग्री ज्यादा चल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार जून से अगस्त के बीच अल-नीनो बनने की संभावना 80 फीसदी से ज्यादा है।

मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत के इन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा

अल-नीनो के एक्टिव होने से देशव्यापी सूखे की घोषणा तुरंत नहीं होती, क्योंकि इसके लिए सरकार बारिश की कमी, मिट्टी की नमी, जलाशयों के पानी का स्तर और फसलों की हालत जैसे कई पैमानों को देखती है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बारिश के असमान बंटवारे को लेकर बहुत ज्यादा बढ़ गई है। सबसे ज्यादा जोखिम इन क्षेत्रों पर है:
मध्य भारत (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का हिस्सा)
उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से)
पश्चिमी भारत (राजस्थान और गुजरात)
मध्य भारत को देश में खेती का मुख्य केंद्र यानी कोर जोन माना जाता है। अगर यहां मानसूनी बारिश कमजोर पड़ती है, तो धान, दाल, मक्का, सोयाबीन, कपास और मूंगफली जैसी मुख्य खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा मवेशियों के चारे और भूजल स्तर पर भी बुरा असर पड़ेगा।

सिर्फ कम बारिश नहीं, समय का फेर भी बनता है सूखे की वजह

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि सूखा सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कुल कितनी बारिश हुई। सबसे जरूरी यह है कि बारिश सही समय पर हो। अगर जून के महीने में अच्छी बारिश हो जाए और उसके बाद जुलाई और अगस्त में लंबा ब्रेक लग जाए, तो पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। इसी तरह यदि पूरे महीने का पानी सिर्फ दो-तीन दिनों में बहुत तेज बारिश के रूप में बरस जाए, तो वह पानी बह जाता है और मिट्टी उसे सोख नहीं पाती। फिलहाल देश के उत्तर-पश्चिम और मध्य हिस्सों में जून के महीने में भीषण गर्मी और लू की स्थिति बनी हुई है। तेज गर्मी के कारण मिट्टी की नमी बहुत तेजी से सूख रही है, जो आने वाले दिनों में किसानों की चिंता और ज्यादा बढ़ा सकती है।
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