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स्मृतिलेखा की सफलता की कहानी
स्मृतिलेखा की सफलता की कहानी
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बड़ी सफलता : गांव में अस्पताल नहीं, इसलिए डॉक्टर बनने निकली स्मृतिलेखा, 603 अंक से रची मिसाल

मेदिनीपुर जिले के पाउशी गांव की स्मृतिलेखा ने NEET UG 2026 में 720 में से 603 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक 9065 प्राप्त की। गांव में अस्पताल न होने और समय पर इलाज के अभाव में लोगों की मौत से प्रेरित होकर उन्होंने डॉक्टर बनने का संकल्प लिया। सरकारी नौकरी छोड़कर कठिन मेहनत की और अब उनका सपना अपने गांव में अस्पताल खोलकर लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 27 Jul 2026, 12:55 PM · अपडेट: 10 Sep 2026, 12:55 AM
पश्चिम बंगाल
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

मेदिनीपुर जिले के छोटे से गांव पाउशी की रहने वाली स्मृतिलेखा की सफलता केवल एक छात्रा की उपलब्धि नहीं है, बल्कि पूरे गांव की उम्मीद और संघर्ष की कहानी है। उन्होंने NEET UG 2026 में 720 में से 603 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक 9065 प्राप्त की। उनकी इस सफलता के पीछे केवल कठिन मेहनत नहीं, बल्कि अपने गांव की स्वास्थ्य समस्याओं को बदलने का संकल्प भी छिपा है। स्मृतिलेखा का कहना है कि उनके गांव में आज भी कोई अस्पताल नहीं है। यदि कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए, तो उसे इलाज के लिए एक से दो घंटे का सफर तय करना पड़ता है। कई बार मरीज अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते और रास्ते में ही उनकी मौत हो जाती है। बचपन से ऐसे कई दर्दनाक दृश्य देखने के बाद उन्होंने तय कर लिया था कि एक दिन डॉक्टर बनकर अपने गांव में ही अस्पताल खोलेंगी, ताकि किसी को इलाज के अभाव में अपनी जान न गंवानी पड़े।

गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव

पाउशी गांव अपनी हरियाली, पहाड़ियों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां का 'मोन चशा' इको-टूरिज्म प्रोजेक्ट ग्रामीण जीवन, खेती और बांस से बने कॉटेज का अनुभव लेने आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करता है। लेकिन इस खूबसूरत गांव की एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि यहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। प्राथमिक उपचार तक के लिए लोगों को दूर-दराज के अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। बारिश, खराब सड़कें और परिवहन की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं। यही कारण है कि गांव के कई परिवार समय पर इलाज न मिलने की वजह से अपनों को खो चुके हैं। इन घटनाओं ने स्मृतिलेखा और उनके परिवार को अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने गांव के लिए कुछ बड़ा करने का संकल्प लिया।

माता-पिता बने सबसे बड़ी ताकत

स्मृतिलेखा एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं। उनकी मां रीता गिरी और पिता बिमल कुमार गिरी दोनों शिक्षक हैं। पिता स्वयं डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण उनका सपना अधूरा रह गया। उन्होंने वही सपना अपनी बेटी की आंखों में देखा और उसे पूरा करने के लिए हर संभव सहयोग दिया। स्मृतिलेखा बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें NEET परीक्षा के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं थी। उन्हें सिर्फ इतना पता था कि डॉक्टर बनना है और लोगों की सेवा करनी है। परिवार ने कभी आर्थिक या मानसिक दबाव को उनके रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया। माता-पिता ने हमेशा उन्हें यह विश्वास दिलाया कि मेहनत और धैर्य के साथ हर मंजिल हासिल की जा सकती है।

NEET एस्पिरेंट्स के लिए जरूरी टिप्स
स्मृतिलेखा की कामयाबी के पीछे परिवार का अटूट साथ

काबिलियत से हासिल की नौकरी

स्मृतिलेखा बचपन से ही पढ़ाई में बेहद मेधावी रही हैं। उन्होंने 10वीं बोर्ड परीक्षा में 94.4 प्रतिशत और 12वीं बोर्ड परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक हासिल किए। उन्होंने PCMB (फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी) विषयों के साथ अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हें 12वीं के बाद भारतीय डाक विभाग में केंद्र सरकार की नौकरी मिल गई। परिवार और समाज के लोगों को लगा कि अब उनका भविष्य सुरक्षित हो गया है। सरकारी नौकरी मिलने के बाद हर कोई चाहता था कि वे उसी में अपना करियर बनाएं, लेकिन उनके मन में डॉक्टर बनने का सपना लगातार जीवित था। आखिरकार उन्होंने सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़कर अपने जीवन का सबसे बड़ा जोखिम उठाने का फैसला किया।

सपने के लिए छोड़ी नौकरी

सरकारी नौकरी छोड़ना किसी भी सामान्य परिवार के लिए आसान निर्णय नहीं होता। स्मृतिलेखा के साथ भी यही स्थिति थी। आसपास के अधिकांश लोगों ने उन्हें समझाया कि इतनी अच्छी नौकरी छोड़ना समझदारी नहीं है। कई लोगों ने कहा कि NEET जैसी कठिन परीक्षा पास करना आसान नहीं होगा और वे अपना भविष्य खतरे में डाल रही हैं। लेकिन उन्होंने महसूस किया कि नौकरी और पढ़ाई दोनों को एक साथ संभालना संभव नहीं है। दो साल नौकरी करने के बाद भी उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। उन्होंने अपने माता-पिता से खुलकर बात की और डॉक्टर बनने की इच्छा जताई। माता-पिता ने बिना किसी हिचकिचाहट के उनका साथ दिया। यही विश्वास उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बन गया और उन्होंने नौकरी छोड़कर पूरी तरह NEET की तैयारी शुरू कर दी।

तानों से दूर रहने के लिए छोड़ना पड़ा अपना घर

दो साल के अंतराल के बाद दोबारा पढ़ाई शुरू करना स्मृतिलेखा के लिए बिल्कुल आसान नहीं था। पहले जो विषय सरल लगते थे, वे दोबारा नए जैसे महसूस होने लगे। दूसरी ओर समाज के लोग लगातार उन्हें असफल होने का डर दिखाते रहे। इन नकारात्मक बातों से बचने और बेहतर माहौल में पढ़ाई करने के लिए उन्होंने अपना गांव छोड़ दिया और सिलीगुड़ी चली गईं। वहां उन्होंने PW विद्यापीठ में दाखिला लिया और पूरी लगन के साथ तैयारी शुरू की। शुरुआत में पढ़ाई की लय बनाना कठिन था, लेकिन शिक्षकों के मार्गदर्शन और लगातार अभ्यास ने धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास वापस लौटा दिया।

470 से 603 अंक तक का शानदार सफर

स्मृतिलेखा की मेहनत का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। वर्ष 2025 में उन्होंने NEET परीक्षा में 470 अंक प्राप्त किए, लेकिन उन्होंने इसे अंतिम मंजिल नहीं माना। उन्होंने अपनी कमजोरियों पर काम किया, NCERT की गहराई से पढ़ाई की, नियमित टेस्ट दिए और हर गलती से सीख ली। इसका परिणाम यह हुआ कि 2026 में उन्होंने 603 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक 9065 प्राप्त कर ली। पिछले वर्ष उनकी रैंक 91,941 थी, जिसे उन्होंने सुधारकर देश के टॉप 10 हजार अभ्यर्थियों में जगह बना ली। यह उपलब्धि साबित करती है कि सही रणनीति, निरंतर मेहनत और आत्मविश्वास से किसी भी असफलता को सफलता में बदला जा सकता है।

नीट के लिए छोड़ दी सरकारी नौकरी
डॉक्टर बनने के सपने की ओर एक बड़ा कदम

NEET अभ्यर्थियों को दी सफलता की अहम सीख

स्मृतिलेखा का मानना है कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता पाने के लिए सबसे पहले अपने लक्ष्य को स्पष्ट करना जरूरी है। वे कहती हैं कि समाज हमेशा कुछ न कुछ कहेगा, इसलिए दूसरों की बातों में उलझने के बजाय अपने सपनों पर विश्वास करना चाहिए। उनका कहना है कि माता-पिता और शिक्षकों का मार्गदर्शन सफलता की सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि छात्र पूरी ईमानदारी और अनुशासन के साथ तैयारी करें, नियमित अभ्यास करें और NCERT की किताबों को अपनी पढ़ाई का आधार बनाएं, तो सफलता जरूर मिलती है। वे हर छात्र से कहती हैं कि आधे-अधूरे मन से नहीं, बल्कि 100 प्रतिशत समर्पण के साथ तैयारी करें।

गांव में अस्पताल खोलने का सपना

स्मृतिलेखा की मंजिल केवल मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाना नहीं है। उनका असली सपना अपने गांव लौटकर वहां एक आधुनिक अस्पताल स्थापित करना है, ताकि किसी भी व्यक्ति को इलाज के लिए घंटों सफर न करना पड़े। वे चाहती हैं कि उनके गांव और आसपास के क्षेत्रों के लोग समय पर इलाज प्राप्त करें और किसी की जान केवल स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में न जाए। उनकी यह कहानी केवल NEET में सफलता की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव, परिवार के विश्वास, त्याग, मेहनत और सेवा की भावना का प्रेरणादायक उदाहरण है। आज स्मृतिलेखा हजारों युवाओं के लिए यह संदेश बन चुकी हैं कि यदि इरादे मजबूत हों और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सफलता का रास्ता जरूर बन जाता है।

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