Hearing Loss: उम्र बढ़ने के साथ सुनने की क्षमता कमजोर होना आम समस्या है। कई लोग इसे बुढ़ापे का स्वाभाविक हिस्सा मानकर जांच या उपचार नहीं कराते। धीरे-धीरे उन्हें बातचीत समझने, फोन पर आवाज सुनने, भीड़भाड़ वाली जगह पर बात पकड़ने या टीवी की आवाज पहचानने में परेशानी होने लगती है। यह समस्या केवल कानों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति के सामाजिक जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और सोचने-समझने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है। हाल के वर्षों में हुए अध्ययनों में सुनने की क्षमता में कमी और डिमेंशिया के बीच संबंध सामने आया है। हालांकि अभी यह साबित नहीं हुआ है कि कम सुनाई देना सीधे डिमेंशिया का कारण बनता है। इसी तरह हियरिंग एड को डिमेंशिया रोकने वाला निश्चित उपचार भी नहीं माना जा सकता।
क्षमता और डिमेंशिया के बीच क्या संबंध है?
डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि याददाश्त, निर्णय लेने, भाषा समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में लगातार गिरावट से जुड़े लक्षणों का समूह है। अल्जाइमर रोग इसका सबसे सामान्य कारण माना जाता है। शोध में पाया गया है कि जिन लोगों में सुनने की समस्या का उपचार नहीं होता, उनमें समय के साथ संज्ञानात्मक गिरावट का खतरा अधिक हो सकता है। वर्ष 2024 की लैंसेट आयोग रिपोर्ट में अनुपचारित सुनने की कमी को डिमेंशिया के ऐसे जोखिम कारकों में शामिल किया गया है, जिन्हें समय रहते नियंत्रित किया जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सुनने की समस्या वाले प्रत्येक व्यक्ति को डिमेंशिया होगा।
मस्तिष्क को करनी पड़ती है अधिक मेहनत
जब किसी व्यक्ति को आवाज स्पष्ट सुनाई नहीं देती, तो मस्तिष्क को अधूरे शब्दों और ध्वनियों का अर्थ निकालने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, परिवार के बीच बातचीत के दौरान कुछ शब्द सुनाई नहीं देने पर व्यक्ति को संदर्भ के आधार पर पूरी बात समझनी पड़ती है। लंबे समय तक मस्तिष्क की ऊर्जा सुनने और शब्द पहचानने में खर्च होने पर याद रखने, ध्यान लगाने और समस्या का समाधान करने जैसे दूसरे कार्य प्रभावित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया सुनने की कमी और संज्ञानात्मक गिरावट के संबंध को समझाने वाले संभावित कारणों में से एक है। हालांकि इस संबंध के पीछे उम्र, हृदय रोग, रक्तचाप, मधुमेह और अन्य स्वास्थ्य कारण भी भूमिका निभा सकते हैं।
दूरी बढ़ा सकती है अकेलापन
सुनने में कठिनाई होने पर व्यक्ति कई बार बातचीत में शामिल होने से बचने लगता है। बार-बार बात दोहराने के लिए कहना, गलत जवाब देना या दूसरों की बात समझ नहीं पाना उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। इसके कारण वह पारिवारिक कार्यक्रमों, सामाजिक बैठकों और दोस्तों से मिलने-जुलने से दूरी बना सकता है। लंबे समय तक सामाजिक अलगाव रहने से अकेलापन, तनाव और अवसाद का खतरा बढ़ सकता है।
मस्तिष्क में बदलाव हो सकते हैं?
सुनना केवल कानों का काम नहीं है। कानों से मिलने वाली ध्वनि को पहचानने और उसका अर्थ समझने का काम मस्तिष्क करता है। लंबे समय तक ध्वनि संबंधी संकेत कम मिलने पर मस्तिष्क के श्रवण से जुड़े हिस्सों की सक्रियता में बदलाव आ सकता है। कुछ अध्ययनों में सुनने की कमी के साथ मस्तिष्क के कुछ भागों में तेजी से सिकुड़न की संभावना भी देखी गई है। वैज्ञानिक अभी यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि ये बदलाव सुनने की समस्या का परिणाम हैं, डिमेंशिया की शुरुआती प्रक्रिया का हिस्सा हैं या दोनों समस्याएं किसी साझा स्वास्थ्य कारण से उत्पन्न होती हैं।
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