India Azerbaijan Ties: अजरबैजान ने भारत से मतभेदों पर खुलकर की बात, व्यापार बढ़ाने पर भी जोर
India Azerbaijan Ties: एस. जयशंकर की अजरबैजान यात्रा के दौरान भारत और अजरबैजान के बीच पुराने मतभेदों, व्यापार और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई। इस दौरे को पाकिस्तान और तुर्की के साथ क्षेत्रीय समीकरणों के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
प्रकाशित: 24 Oct 2026, 04:59 PM· 4 मिनट पढ़ने का समय
अजरबैजान
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India Azerbaijan Ties: दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के बदलते कूटनीतिक समीकरणों के बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अज़रबैजान यात्रा वैश्विक कूटनीति का नया केंद्र बनी हुई है। आठ वर्षों में किसी भारतीय विदेश मंत्री का यह पहला बाकू दौरा है। जहाँ एक तरफ द्विपक्षीय व्यापार और ऊर्जा सहयोग को नई गति देने पर सहमति बनती दिख रही है, वहीं दूसरी तरफ दशकों पुराने मतभेदों को भी खुले तौर पर स्वीकार किया गया है।
विदेश मंत्री के सामने ही अज़रबैजान ने की मतभेदों की बात
अज़रबैजान की राजधानी बाकू पहुँचे एस. जयशंकर ने शुक्रवार को राष्ट्रपति इलहाम अलियेव और विदेश मंत्री जेहुन बेरामोव से उच्चस्तरीय वार्ता की। संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान अज़रबैजान के विदेश मंत्री जेहुन बेरामोव ने किसी औपचारिकता में पड़े बिना स्पष्ट शब्दों में कहा, "यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कई अहम मुद्दों पर हमारे बीच गंभीर मतभेद रहे हैं। इन मतभेदों ने हमारे द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आपसी सहयोग पर भी असर डाला है।" हालाँकि, बेरामोव ने आगे कहा कि इस मुलाकात में दोनों पक्षों ने बेहद खुले और रचनात्मक माहौल में बातचीत की है और उम्मीद जताई कि जल्द ही इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। भारतीय विदेश मंत्री ने भी संकेत दिया कि दोनों देश अब अपने रिश्तों को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए तैयार हैं।
Ishaq Dar met Turkish Foreign Minister Hakan Fidan during his visit to Türkiye.यात्रा का समय और क्षेत्रीय कूटनीति के मायने
जयशंकर की यह यात्रा कई मायनों में बेहद रणनीतिक समय पर हो रही है। जब भारतीय विदेश मंत्री बाकू में थे, ठीक उसी समय पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री इसहाक़ डार तुर्की के दौरे पर थे। हाल के हफ़्तों में तुर्की और अज़रबैजान के बीच कुछ अंदरूनी खींचतान देखने को मिली है। अज़रबैजान द्वारा स्कूलों में छात्राओं के हिजाब पहनने पर लगाए गए प्रतिबंध की तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की पार्टी ने तीखी आलोचना की थी, जिसे बाकू ने अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना। इसके अलावा, अज़रबैजान की इसराइल के साथ बढ़ती नजदीकी भी तुर्की और ईरान दोनों के लिए सहज नहीं है। शिया बहुल देश होने के बावजूद अज़रबैजान के संबंध पड़ोसी ईरान से तनावपूर्ण रहे हैं, जबकि इसराइल के साथ उसके व्यापारिक व रक्षा संबंध काफी मजबूत हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और व्यापारिक उछाल
बीते कुछ सालों में भारत और अज़रबैजान के रिश्ते काफी उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' और आर्मीनिया के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी को लेकर बाकू ने नाराजगी जताई थी। लेकिन अब बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति अलियेव की मुलाकात के बाद रिश्तों में नया मोमेंटम देखने को मिल रहा है। आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के आंकड़े बेहद उत्साहजनक हैं:
2025 का कुल व्यापार: लगभग 40 करोड़ डॉलर
2026 की पहली छमाही (6 महीने): लगभग 60 करोड़ डॉलर
क्या इसराइल है इस नई नजदीकी का कारण?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस दौरे को लेकर दो अलग-अलग राय हैं। तुर्की की टीसी बातमन यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर दुनया बसोल का मानना है कि भारत और अज़रबैजान के करीब आने में इसराइल की परोक्ष भूमिका हो सकती है, क्योंकि अज़रबैजान पूरी तरह स्वतंत्र विदेश नीति की ओर बढ़ रहा है। हालाँकि, बाकू की ख़ज़ार यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ लेक्चरर वासिफ़ हुसेनोव इस तर्क को खारिज करते हैं। हुसेनोव का कहना है, अज़रबैजान अपनी विदेश नीति किसी तीसरे देश के आधार पर तय नहीं करता। भारत के साथ संबंधों में आई नई गति के पीछे ऊर्जा क्षेत्र का सहयोग, बेहतर कनेक्टिविटी की चाह और शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई सीधी बातचीत मुख्य कारण हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि भारत से संबंध सुधारने का मतलब पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को कमजोर करना बिल्कुल नहीं है।
विशेषज्ञ जयशंकर के इस दौरे को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के बड़े कैनवास पर देख रहे हैं। अज़रबैजान के विश्लेषक डॉ. अहमद शाहिदोव का मानना है कि दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के देश अब अपनी-अपनी कूटनीतिक सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। दूसरी ओर, मध्य पूर्व मामलों के जानकार अहमद क़ुरैशी के अनुसार, भारत ऐतिहासिक रूप से ईरान और आर्मीनिया के करीब रहा है, जबकि पाकिस्तान ने खुलकर अज़रबैजान का समर्थन किया है। ऐसे समय में भारत का बाकू तक पहुँचना उसकी सक्रिय और संतुलनकारी विदेश नीति का प्रमाण है। बाकू दौरे के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वहाँ स्थित प्राचीन ऐतिहासिक हिंदू मंदिर का भी दौरा किया, जो दोनों देशों के बीच प्राचीन सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों का प्रतीक माना जाता है।