UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अभी से बिसात बिछानी शुरू कर दी है। राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए संगठन पूरी तरह एक्शन मोड में आ चुका है। पार्टी आलाकमान इस बार किसी भी तरह का सियासी जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। यही वजह है कि अंदरखाने एक ऐसी रणनीति तैयार की गई है, जिससे एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का काट निकाला जा सके। सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी अपने लगभग 100 मौजूदा विधायकों के पत्ते साफ कर सकती है। पार्टी के एक गोपनीय इंटरनल सर्वे में यह बात सामने आई है कि इन विधायकों के रिपोर्ट कार्ड से न तो क्षेत्र की जनता खुश है और न ही संगठन उनके काम से संतुष्ट है।
आरएसएस से लिया गया फीडबैक, जनता की नाराजगी पड़ी भारी
खबर है कि विधायकों के टिकट काटने का यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके लिए पार्टी ने विधानसभा स्तर पर बाकायदा सर्वे कराया और जमीनी हकीकत जानी। केवल इतना ही नहीं, उम्मीदवारों की साख और जनता में उनकी पकड़ को परखने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से भी खास फीडबैक लिया गया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि दो कार्यकाल पूरे करने के बाद अक्सर पूरी सरकार के बजाय व्यक्तिगत विधायकों के खिलाफ जनआक्रोश ज्यादा होता है। अगर ऐसे चेहरों पर दोबारा दांव लगाया गया, तो चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसीलिए एंटी-इनकंबेंसी के असर को बेअसर करने के लिए इन पुराने और विवादित चेहरों की जगह नए और युवा दावेदारों को मौका देने की योजना है।
लोकसभा चुनाव के नतीजों से ली सीख
बीजेपी की इस सख्ती के पीछे हालिया लोकसभा चुनावों के कड़वे अनुभव भी शामिल हैं। 2024 के आम चुनाव में पार्टी ने 49 मौजूदा सांसदों को फिर से मैदान में उतारा था, लेकिन उनमें से 27 को हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, हाल के अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी बड़े पैमाने पर टिकट काटे गए थे। 'दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है'—इस सियासी कहावत को बीजेपी बखूबी समझती है। इसीलिए 2027 के महासमर में जीत की हैट्रिक दर्ज करने के लिए पार्टी हर कड़ा और कड़ा फैसला लेने को तैयार है।
प्रदर्शन ही बनेगा टिकट का पैमाना
हालांकि, इस कड़े रुख के बीच उन विधायकों को राहत मिल सकती है जिनकी अपने क्षेत्र में पकड़ मजबूत है। अगर किसी विधायक का जनाधार मजबूत है, जनता के बीच छवि साफ है और उसकी जीत की संभावना पक्की दिखती है, तो पार्टी उसे दोबारा मौका देने में परहेज नहीं करेगी—फिर चाहे वह कितने ही समय से विधायक क्यों न रहा हो।

