Tuesday, 04 Aug 2026 भारत
ब्रेकिंग
महासमुंद में उड़ीसा से आ रहा 22 किलो गांजा जब्त, स्कूटी की सीट और डिक्की में छुपाकर ला रहे थे दो युवक मुंगेली सड़क हादसा : तखतपुर CMO अमरेश सिंह गिरफ्तार, दो महिलाओं की मौत के बाद कोर्ट ने भेजा जेल बीईओ दफ्तर के बाबू की सुस्ती से सैकड़ों शिक्षक-कर्मचारी बेहाल, जुलाई बीतने के बाद भी नहीं आया वेतन चार नकाबपोश बदमाशों ने रोकी बाइक, कांग्रेस नेता की हत्या कर मोबाइल-नकदी लूटी कार का शीशा तोड़कर 4.90 लाख उड़ाने वाली गैंग बेनकाब, शोरूम कर्मचारी ही निकला मास्टरमाइंड, युवती समेत 5 गिरफ्तार करोड़ की ठगी : 45 करोड़ के नकली नोटों का झांसा देकर फरार हुए शातिर, रायपुर पुलिस जांच में जुटी महासमुंद में उड़ीसा से आ रहा 22 किलो गांजा जब्त, स्कूटी की सीट और डिक्की में छुपाकर ला रहे थे दो युवक मुंगेली सड़क हादसा : तखतपुर CMO अमरेश सिंह गिरफ्तार, दो महिलाओं की मौत के बाद कोर्ट ने भेजा जेल बीईओ दफ्तर के बाबू की सुस्ती से सैकड़ों शिक्षक-कर्मचारी बेहाल, जुलाई बीतने के बाद भी नहीं आया वेतन चार नकाबपोश बदमाशों ने रोकी बाइक, कांग्रेस नेता की हत्या कर मोबाइल-नकदी लूटी कार का शीशा तोड़कर 4.90 लाख उड़ाने वाली गैंग बेनकाब, शोरूम कर्मचारी ही निकला मास्टरमाइंड, युवती समेत 5 गिरफ्तार करोड़ की ठगी : 45 करोड़ के नकली नोटों का झांसा देकर फरार हुए शातिर, रायपुर पुलिस जांच में जुटी
W 𝕏 f
होम कलमकार यति यतनलाल जी महाराज साहब : एक ऐसे संत जिन्होंने …
यति यतनलाल जी की कहानी
यति यतनलाल जी की कहानी
कलमकार Featured

यति यतनलाल जी महाराज साहब : एक ऐसे संत जिन्होंने सम्मान की जगह सेवा को चुना और लोकमंगल के महायोगी कहलाए

परम पूज्य यति यतनलाल जी महाराज का जीवन त्याग, तप, राष्ट्रसेवा और मानवता की अद्वितीय मिसाल है। वर्ष 1894 में राजस्थान के बीकानेर में जन्मे यति जी ने बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक जीवन अपनाया और आगे चलकर जैन धर्म के विद्वान संत बने। उन्होंने धर्म को केवल पूजा तक सीमित न रखकर सेवा, करुणा और जनकल्याण का माध्यम बनाया। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने सक्रिय भाग लिया, अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया, पाँच बार जेल गए और लगभग सात वर्ष का कारावास झेला। वर्ष 1924 में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की दूरदर्शी परिकल्पना प्रस्तुत की, जो बाद में साकार हुई। हैजा महामारी के समय उन्होंने स्वयं गाँव-गाँव जाकर रोगियों की सेवा की। उन्होंने पद, सम्मान और सरकारी सुविधाओं को अस्वीकार करते हुए लोकसेवा को ही अपना सबसे बड़ा पुरस्कार माना। महासमुंद स्थित श्री विवेक वर्धन सेवा आश्रम तथा यति यतनलाल जैन अस्पताल उनके लोकमंगल की जीवंत विरासत हैं। उनका संपूर्ण जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची महानता पद, प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और मानवता के लिए समर्पित कर्म में निहित होती है।

कलमकार
04 Aug 2026, 08:55 AM
महासमुंद
इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे दर्ज होते हैं, जिन्हें पढ़ते समय सिर्फ घटनाएं याद नहीं आतीं, एक पूरा युग आंखों के सामने जीवंत हो उठता है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन किसी एक धर्म, एक समाज या एक क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधता। वे अपने कर्मों से मानवता की धरोहर बन जाते हैं। परम पूज्य यति यतनलाल जी महाराज साहब ऐसे ही विरल संत थे। वे केवल तपस्वी, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी नहीं थे। वे उन दुर्लभ विभूतियों में थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, समाज और मानवता को समर्पित कर दिया।

बाल्यकाल से ही तय हो गया था सेवा का पथ

धनतेरस के पावन दिन वर्ष 1894 में राजस्थान के बीकानेर में जन्मे यति जी की जीवन-यात्रा साधारण नहीं थी। मात्र सात महीने की आयु में उन्हें पूज्य उपाध्याय श्री विवेकवर्धन जी महाराज को समर्पित कर दिया गया। मानो प्रकृति ने उसी क्षण तय कर दिया था कि यह बालक अपने लिए नहीं, हजारों-लाखों लोगों के जीवन में प्रकाश फैलाने के लिए जन्मा है। रायपुर में जैन समाज की माताओं के वात्सल्य और संस्कारों के बीच उनका व्यक्तित्व निखरता गया। बीस वर्ष की आयु में उन्होंने जैन दीक्षा ग्रहण की और फिर त्याग, तप, अनुशासन और सेवा उनके जीवन का पर्याय बन गए।

त्याग से तप तक: एक संत का निर्माण

यति यतनलाल जी का जीवन धर्म केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं था। वे संस्कृत, इतिहास, गीता और जैन दर्शन के प्रकांड विद्वान थे, लेकिन उनके प्रवचन पुस्तकों के ज्ञान से कहीं आगे जाकर जीवन का पाठ पढ़ाते थे। वे कहते नहीं थे, जीकर दिखाते थे कि धर्म का वास्तविक स्वरूप करुणा, सेवा, सत्य और मानवता है। उनके लिए मंदिर में जलाया गया दीपक तभी सार्थक था, जब उसके प्रकाश से किसी जरूरतमंद का जीवन भी रोशन हो। जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब उन्होंने संत का मौन नहीं, बल्कि कर्म का मार्ग चुना। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम में उतर पड़े। नमक सत्याग्रह हो, सविनय अवज्ञा आंदोलन हो, जंगल सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार या भारत छोड़ो आंदोलन, हर संघर्ष में उनका योगदान अग्रिम पंक्ति में रहा। पांच बार जेल गए, लगभग सात वर्षों तक कारावास झेला, लेकिन उनके चेहरे का तेज कभी कम नहीं हुआ। वे जानते थे कि स्वतंत्रता राजनीतिक अधिकार नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।

जब एक संत ने भविष्य की धड़कन सुन ली

उनकी दूरदर्शिता का एक और अद्भुत उदाहरण वर्ष 1924 में सामने आया, जब उन्होंने रायपुर जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग रखी। उस समय बहुत कम लोग उनके विचार को समझ सके। लेकिन इतिहास ने लगभग पचहत्तर वर्षों बाद स्वयं गवाही दी। जब 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया, तब लोगों ने महसूस किया कि सच्चे संत वर्तमान ही नहीं देखते, वे भविष्य की धड़कनों को भी सुन लेते हैं। 

महामारी के बीच मानवता का सबसे उज्ज्वल चेहरा

सन 1934 में हैजा महामारी ने रायपुर जिले के अनेक गांवों को अपनी चपेट में ले लिया। भय ऐसा था कि लोग अपने बीमार परिजनों तक को छोड़कर भाग रहे थे। उस समय जहां हर कदम पीछे हट रहा था, वहां यति यतनलाल जी अकेले आगे बढ़ रहे थे। वे गांव-गांव पहुँचे, रोगियों की सेवा की, भोजन और दवा की व्यवस्था कराई, लोगों का मनोबल बढ़ाया और यह संदेश दिया कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। यही एक सच्चे संत की पहचान है, जो संकट के समय सबसे आगे दिखाई दे।

जिन्होंने पद नहीं, सेवा को अपना सम्मान माना

आज जब सम्मान और प्रसिद्धि की चाह सामान्य बात बन गई है, तब यति जी का जीवन और भी प्रेरणादायक लगता है। उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने का अवसर मिला, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया। स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से भी उन्होंने इनकार कर दिया। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मानित करने का निमंत्रण भेजा, तब उनका उत्तर था कि भारत स्वतंत्र हो गया, यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है। यह एक वाक्य नहीं, उनके पूरे जीवन का दर्शन था।

सेवा को संस्थागत स्वरूप देने का संकल्प

सन 1940 में महासमुंद में स्थापित श्री विवेक वर्धन सेवा आश्रम उनके विचारों का साकार रूप है। यह आश्रम आज एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, चिकित्सा, पुस्तकालय, आध्यात्मिक जागरण और जनसेवा का जीवंत केंद्र बन गया। आगे चलकर उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप यति यतनलाल जैन अस्पताल की स्थापना हुई, जहाँ निर्धन और जरूरतमंद लोगों को सम्मानपूर्वक उपचार मिलने लगा। यही वह विरासत है, जो किसी भी स्मारक से कहीं अधिक महान है। आज भी छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनके नाम पर प्रदान किया जाने वाला यति यतनलाल अहिंसा पुरस्कार आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने का माध्यम है कि सेवा कभी पुरानी नहीं होती और त्याग कभी छोटा नहीं होता।

अहिंसा, सेवा और त्याग की अमर विरासत

यति यतनलाल जी महाराज का जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि महानता ऊंचे पदों से नहीं, ऊंचे विचारों से जन्म लेती है। वे एक संत के साथ सेवा की चलती-फिरती पाठशाला थे। वे स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, राष्ट्र की चेतना थे। वे इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय होने के साथ आज भी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं, जो अपने जीवन को अपने लिए नहीं, समाज के लिए सार्थक बनाना चाहता है।

जब जीवन स्वयं एक संदेश बन जाता है

ऐसे युगपुरुषों का जीवन हमें यही संदेश देता है मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसके शब्दों से नहीं, उसके कर्मों से होती है। और जब कर्म सेवा बन जाए, त्याग साधना बन जाए और जीवन लोकमंगल के लिए समर्पित हो जाए, तब इतिहास उसे यति यतनलाल जी महाराज के नाम से याद करता है।
क्या यह खबर उपयोगी लगी?
शेयर करें अपने दोस्तों तक पहुंचाएं
WhatsApp Telegram
हमारे WhatsApp ग्रुप से जुड़ें — ताज़ा खबरें सबसे पहले पाएं!
कीर्तिमान
गाइए और छा जाइए
कलमकार
छत्तीसगढ़
सभी छत्तीसगढ़ ›
रायपुर संभाग
दुर्ग संभाग
बिलासपुर संभाग
सरगुजा संभाग
बस्तर संभाग
भारत
विदेश
राजनीति
मनोरंजन
खेल
तकनीक
कारोबार
शिक्षा सेहत धर्म यात्रा राशिफल डार्क/लाइट मोड डॉ. नीरज गजेंद्र
वीडियो
अभी कोई वीडियो उपलब्ध नहीं है
Clip & Share

अगली खबर के लिए ऊपर और पिछली खबर के लिए नीचे स्वाइप करें

सावधान: संवेदनशील सामग्री
इस अनुभाग में अपराध, हिंसा, दुर्घटना या अन्य संवेदनशील विषयों से संबंधित समाचार हो सकते हैं। क्या आप इसे देखना चाहते हैं?
ताज़ा खबरें सबसे पहले पाएं!
पुश नोटिफिकेशन चालू करें