आदिम जाति कल्याण विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। जिले में महज 10 दिनों के भीतर दूसरे आदिवासी छात्र की मलेरिया से मौत होने से छात्रावासों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खुलती नजर आ रही है। मृतक छात्र मरदापोटी बालक आवासीय आश्रम का निवासी था और वहीं रहकर पढ़ाई कर रहा था। छात्र की मौत के बाद परिजनों, स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों में नाराजगी बढ़ गई है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने आदिवासी छात्रावासों में रहने वाले बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।जानकारी के अनुसार, छात्र की 24 जुलाई को मलेरिया जांच कराई गई थी, जिसमें उसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद आश्रम प्रबंधन द्वारा उसे निर्धारित मलेरिया रोधी दवाओं की डोज दी गई।
पॉजिटिव आने के बाद शुरू हुआ इलाज
हालांकि इलाज के बावजूद उसकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ और कुछ ही समय बाद उसकी हालत लगातार बिगड़ने लगी। गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे तत्काल कांकेर के मातृत्व एवं शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। तमाम प्रयासों के बावजूद उपचार के दौरान छात्र ने दम तोड़ दिया। इस घटना ने समय पर इलाज और स्वास्थ्य निगरानी की व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
10 दिन में दूसरी मौत से बढ़ी चिंता
जिले में 10 दिनों के भीतर मलेरिया से दो आदिवासी छात्रों की मौत होना बेहद चिंताजनक माना जा रहा है। लगातार सामने आ रहे मामलों से यह आशंका भी जताई जा रही है कि छात्रावासों में स्वास्थ्य परीक्षण और संक्रमण की रोकथाम के उपाय पर्याप्त नहीं हैं। यदि नियमित स्वास्थ्य जांच, समय पर स्क्रीनिंग और प्रभावी निगरानी होती, तो शायद इन घटनाओं को रोका जा सकता था। अब अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने छात्रावासों की स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग तेज कर दी है।दो अन्य छात्र भी अस्पताल में भर्ती
बताया जा रहा है कि मरदापोटी बालक आवासीय आश्रम के दो अन्य छात्र भी वर्तमान में बीमार हैं और उनका इलाज कांकेर के मातृत्व एवं शिशु अस्पताल में जारी है। इन घटनाओं के बाद पूरे आश्रम परिसर और जिले के अन्य छात्रावासों में स्वास्थ्य जांच अभियान चलाने की मांग उठने लगी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को सभी छात्रावासों में विशेष मलेरिया जांच शिविर, नियमित मेडिकल परीक्षण, साफ-सफाई और दवा वितरण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।