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मोटेअनाज : दूर  हो सकती है विटामिन की कमी, नई रिसर्च में बड़ा खुलासा

भारत में शाकाहारी लोगों में विटामिन बी12, विटामिन डी और आयरन की कमी तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली के शोधकर्ताओं की नई स्टडी में सामने आया है कि बाजरा, ज्वार, रागी जैसे पारंपरिक मोटे अनाज और उन्हें खाने के देसी तरीके शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को बेहतर बना सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भिगोकर, अंकुरित या फर्मेंटेड रूप में मोटे अनाज खाने से शरीर को आयरन, कैल्शियम और अन्य जरूरी पोषक तत्व अधिक आसानी से मिलते हैं। बदलती लाइफस्टाइल और जंक फूड के बढ़ते चलन के बीच अब भारतीय पारंपरिक खानपान को बेहतर स्वास्थ्य और पोषण के लिए फिर से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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प्रकाशित: 20 May 2026, 03:49 PM · अपडेट: 28 Oct 2026, 02:20 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
भारत में बदलती जीवनशैली और खानपान की आदतों के बीच अब एक नई रिसर्च ने पारंपरिक भारतीय भोजन की अहमियत को फिर से सामने ला दिया है। देश में बड़ी संख्या में लोग शाकाहारी भोजन करते हैं और ऐसे लोगों में अक्सर विटामिन बी12, विटामिन डी और आयरन जैसे जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी देखने को मिलती है। 
डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक इन पोषक तत्वों की कमी रहने से शरीर में कमजोरी, लगातार थकान, हड्डियों की कमजोरी, एनीमिया और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई परेशानियां बढ़ सकती हैं। दिल्ली के शोधकर्ताओं की नई स्टडी में यह सामने आया है कि भारत के पारंपरिक मोटे अनाज और उन्हें खाने के पुराने देसी तरीके शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल भोजन का मामला नहीं, बल्कि भारतीय खानपान संस्कृति की वैज्ञानिक समझ का भी उदाहरण है।

भारत में बढ़ रही माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग धीरे-धीरे पारंपरिक भोजन से दूर होते जा रहे हैं। घर के बने संतुलित खाने की जगह अब प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड और अत्यधिक रिफाइंड आहार ने ले ली है। यही वजह है कि भारत में खासतौर पर विटामिन बी12, विटामिन डी और महिलाओं में आयरन की कमी तेजी से बढ़ रही है। विटामिन बी12 मुख्य रूप से मांस, अंडे और डेयरी उत्पादों जैसे एनिमल बेस्ड फूड में पाया जाता है, इसलिए शाकाहारी लोगों में इसकी कमी अधिक देखने को मिलती है। वहीं विटामिन डी की कमी का बड़ा कारण धूप में कम समय बिताना और बंद कमरों वाली आधुनिक जीवनशैली को माना जा रहा है। महिलाओं में आयरन की कमी और एनीमिया आज भी भारत की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हैं।

मोटे अनाज रोजमर्रा की आवश्यकता 

इसी बीच बाजरा, ज्वार, रागी और कोदो जैसे मोटे अनाज एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। इन्हें “मिलेट्स” कहा जाता है और अब वैज्ञानिक भी इनके फायदों को लेकर गंभीरता से अध्ययन कर रहे हैं। रिसर्च में सामने आया है कि भारतीय पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए मोटे अनाज केवल फाइबर और मिनरल्स से भरपूर नहीं होते, बल्कि शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को भी बेहतर बना सकते हैं। पुराने समय में लोग इन अनाजों को भिगोकर, अंकुरित करके, किण्वित यानी फर्मेंटेड रूप में या देसी तरीकों से पकाकर खाते थे। इन प्रक्रियाओं से भोजन में मौजूद एंटी-न्यूट्रिएंट्स कम हो जाते हैं और शरीर को आयरन, कैल्शियम तथा अन्य जरूरी पोषक तत्वों को अवशोषित करने में आसानी होती है।

सप्लीमेंट्स नहीं, पारंपरिक तरीका अपनाएं 

आज बड़ी संख्या में लोग विटामिन और आयरन की कमी दूर करने के लिए सप्लीमेंट्स लेते हैं, लेकिन कई बार शरीर उन पोषक तत्वों को पूरी तरह अवशोषित नहीं कर पाता। नई रिसर्च यह संकेत देती है कि यदि संतुलित पारंपरिक भोजन और मोटे अनाज को सही तरीके से आहार में शामिल किया जाए, तो सप्लीमेंट्स का असर भी बेहतर हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल दवाइयों पर निर्भर रहने की बजाय भोजन की गुणवत्ता और पारंपरिक खानपान की आदतों पर भी ध्यान देना बेहद जरूरी है।

महिलाओं और बच्चों के लिए जरूरी

भारत में महिलाएं और बच्चे माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित माने जाते हैं। आयरन और विटामिन की कमी के कारण कमजोरी, चक्कर आना, लगातार थकान, बच्चों में कमजोर शारीरिक विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और घरों में पारंपरिक पौष्टिक भोजन को फिर से बढ़ावा दिया जाए, तो पोषण से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं को कम किया जा सकता है।

बदलती लाइफस्टाइल बड़ी वजह

 बदलती लाइफस्टाइल इस समस्या को और बढ़ा रही है। देर रात तक जागना, धूप में कम निकलना, जंक फूड का बढ़ता सेवन और शारीरिक गतिविधियों की कमी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी के बड़े कारण बन चुके हैं। ऐसे में संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की वापसी को बेहद जरूरी माना जा रहा है।

मोटे अनाज की अहमियत

भारत सरकार भी पिछले कुछ वर्षों से मोटे अनाज को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा “इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स” घोषित किए जाने के बाद देशभर में बाजरा और अन्य पारंपरिक अनाजों को लेकर जागरूकता बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय रसोई में मौजूद पारंपरिक ज्ञान केवल स्वाद तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार भी छिपा था। आज जब पूरी दुनिया हेल्दी फूड और नेचुरल डाइट की ओर लौट रही है, तब भारत के पारंपरिक मोटे अनाज और देसी खाने के तरीके फिर से लोगों के लिए उम्मीद बनकर सामने आ रहे हैं।
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