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22 साल बाद जेल से राहत, सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत दी जमानत; ओडिशा हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ओडिशा में उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। आरोपी पिछले 22 वर्षों से जेल में बंद था और उसकी सजा के खिलाफ दायर अपील लगभग 3157 दिनों की देरी से दाखिल होने के कारण ओडिशा हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
09 May 2026, 04:40 PM
नई दिल्ली

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। यह कैदी पिछले 22 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद था। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें लंबी देरी के आधार पर उसकी अपील को स्वीकार करने से इनकार किया गया था।

 2006 से जेल में बंद था कैदी

यह मामला ओडिशा के नबरंगपुर जिले का है। आरोपी अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन को वर्ष 2006 में सत्र न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 201 (सबूत मिटाने) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद वह लगातार जेल में बंद रहा।

हाईकोर्ट ने किया था खारिज

दोषी ने अपनी सजा के खिलाफ ओडिशा हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, लेकिन यह अपील लगभग 3157 दिनों की देरी से दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने 11 जनवरी 2016 को देरी माफी याचिका खारिज करते हुए अपील को भी निरस्त कर दिया था। अदालत ने कहा था कि देरी का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।

न्याय से वंचित करना गलत

मामले की सुनवाई करते हुए Supreme Court of India की पीठ—न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां—ने हाईकोर्ट के रवैये पर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि केवल प्रक्रिया संबंधी देरी के आधार पर अपील को खारिज करना उचित नहीं था।

दाखिल हुई थी अपील

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि जब अपील दायर की गई, तब आरोपी पहले ही 12 वर्षों से अधिक सजा काट चुका था। ऐसे में उसे केवल तकनीकी कारणों से न्यायिक सुनवाई से वंचित करना न्यायोचित नहीं माना जा सकता।

 नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अपील जेल के माध्यम से दायर की गई थी, इसलिए परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट को सहानुभूतिपूर्ण और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए कैदी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि न्याय केवल नियमों की कठोरता तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि उसमें मानवीय दृष्टिकोण भी जरूरी है।

फैसला बना महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल

यह निर्णय न्यायिक व्यवस्था में लंबित अपीलों और तकनीकी आधार पर खारिज मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि न्याय प्रक्रिया में संवेदनशीलता और व्यावहारिक दृष्टिकोण भी उतना ही जरूरी है।

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