अबूझमाड़ : उफनते नालों के बीच ITBP ने बांधी उम्मीद की डोर, लकड़ी के अस्थायी पुलों से 14 गांवों को मिली नई जिंदगी
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ क्षेत्र में मानसून के दौरान आने वाली परेशानियों को कम करने के लिए ITBP की 44वीं वाहिनी ने ग्रामीणों के साथ मिलकर लकड़ी के अस्थायी फुट ब्रिज तैयार किए हैं। ओरछा ब्लॉक के करीब 14 गांवों में बने इन पुलों से बारिश के दौरान बंद होने वाली आवाजाही फिर शुरू हो गई है। अब ग्रामीण सुरक्षित तरीके से पैदल और दोपहिया वाहनों से नाले पार कर पा रहे हैं।
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कीर्तिमान न्यूज
03 Aug 2026, 09:18 AM
नारायणपुर
छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ इलाका मानसून के आते ही अक्सर बाहरी दुनिया से कट जाता है। घने जंगलों के बीच जब बरसाती नाले उफान पर आते हैं, तो सड़कें गायब हो जाती हैं और इलाज, पढ़ाई से लेकर राशन-पानी तक हर बुनियादी जरूरत पर ब्रेक लग जाता है। लेकिन इस बार बारिश के इस खौफ के बीच राहत की एक नई तस्वीर सामने आई है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की 44वीं वाहिनी के जवानों ने स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर जंगलों में लकड़ी के ऐसे अस्थायी 'फुट ब्रिज' खड़े कर दिए हैं, जिन्होंने दर्जनों गांवों की आवाजाही को फिर से बहाल कर दिया है। ओरछा ब्लॉक के करीब 14 गांवों में जवानों ने बिना किसी बड़े मशीनरी तंत्र के, सिर्फ स्थानीय लकड़ी और उपलब्ध संसाधनों की मदद से ये पुल तैयार किए हैं।
बरसात में बड़ी राहतसालों से पक्की सड़कें और स्थायी पुल नहीं
कल तक जिन नालों को उफनते पानी के बीच पार करना मौत को दावत देने जैसा था, आज वहां से ग्रामीण पैदल और दोपहिया वाहनों से सुरक्षित निकल रहे हैं। माओवाद प्रभावित इलाका होने की वजह से अबूझमाड़ के अंदरूनी हिस्सों में सालों से पक्की सड़कें और स्थायी पुल नहीं बन सके। नतीजा यह होता था कि हर मानसून में गांव टापू बन जाते थे। किसी बीमार को अस्पताल ले जाना हो, तो ग्रामीणों को खटिया (चारपाई) पर लादकर जान जोखिम में डालते हुए नाले पार करने पड़ते थे।
लकड़ी के पुल ने दूर की मुसीबत
बच्चों का स्कूल जाना पूरी तरह बंद हो जाता था। गांव के माड़वी भीमा बताते हैं, "पहले जैसे ही बारिश शुरू होती थी, लगता था हम सब कैद हो गए हैं। बाहर की दुनिया से कोई नाता ही नहीं रहता था। अब इन लकड़ी के पुलों ने हमें बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया है।" वहीं कुतुल गांव की रहने वाली हिडमे कवासी का कहना है कि अब बच्चों को स्कूल भेजते वक्त वो डर नहीं लगता, जो पहले हुआ करता था।
सुरक्षा के साथ सेवा का संकल्प
ITBP की 44वीं वाहिनी के सेनानी सिद्धिक पी. पी. के अनुसार, जवानों का मकसद सिर्फ मोर्चे पर सुरक्षा तैनात रखना नहीं है, बल्कि संकट के समय ग्रामीणों के साथ खड़े होना भी है। उन्होंने बताया कि जब तक इलाके में पक्के पुलों का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक लकड़ी से बने ये अस्थायी पुल ही हजारों ग्रामीणों के लिए 'लाइफलाइन' का काम करेंगे।