CG High Court: सरकारी स्कूल के शेड, रसोईघर और शौचालय के निर्माण में इस्तेमाल की गई निजी जमीन के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने राज्य शासन के अधिकारियों को जमीन मालिक को 0.15 एकड़ के बराबर उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के परिजन की कथित सहमति के आधार पर उसकी निजी जमीन का सरकारी उपयोग वैध नहीं माना जा सकता। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने बिलासपुर जिले के मस्तूरी निवासी आशीष अवस्थी की याचिका पर यह आदेश दिया है।
तहसीलदार ने दिया था कब्जा लौटाने का आदेश
आशीष अवस्थी ने जमीन वापस दिलाने के लिए तहसीलदार के समक्ष आवेदन किया था। इस पर 29 दिसंबर 2022 को तहसीलदार ने जमीन का कब्जा लौटाने का आदेश जारी किया। हालांकि, स्कूल के विद्यार्थियों को असुविधा न हो, इसे देखते हुए याचिकाकर्ता ने जमीन के बदले बराबर मूल्य की वैकल्पिक सरकारी भूमि देने की मांग की। इसके बाद अतिरिक्त कलेक्टर ने 27 नवंबर 2024 को उनका आवेदन खारिज कर दिया। आवेदन खारिज करने के पीछे तर्क दिया गया कि आशीष के पिता दुर्गा सहाय अवस्थी वर्ष 2005 से 2010 तक गांव के सरपंच थे और निर्माण कार्य के दौरान उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
निजी जमीन पर हुआ था स्कूल का निर्माण
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता आशीष अवस्थी मस्तूरी तहसील के खसरा नंबर 66/14 की कुल 85 डिसमिल जमीन के दर्ज भूमिस्वामी हैं। यह जमीन 21 जनवरी 2021 को उनके नाम दर्ज हुई थी। उनकी जमीन से लगी सरकारी भूमि पर बालक प्राथमिक शाला संचालित है। स्कूल के विद्यार्थियों और कर्मचारियों की सुविधा के लिए बनाए गए शेड, रसोईघर और शौचालय के निर्माण में आशीष की निजी जमीन का करीब 0.15 एकड़ हिस्सा इस्तेमाल किया गया था।पिता की कथित सहमति को हाई कोर्ट ने नहीं माना पर्याप्त
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि पिता की कथित सहमति को निजी जमीन के इस्तेमाल की वैध अनुमति नहीं माना जा सकता। सहमति, समझौते या स्वेच्छा से जमीन देने का कोई वैधानिक प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
90 दिनों के भीतर कार्रवाई के निर्देश
बिलासपुरने अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की सहमति लेकर आदेश की प्रति प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर 0.15 एकड़ के बराबर उपयुक्त वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के संबंध में आवश्यक आदेश पारित किए जाएं। इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निराकरण कर दिया।






