CG News: सरगुजा वनवृत्त में इन दिनों हाथियों की बढ़ती मौजूदगी ने किसानों और ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। वनवृत्त के अलग-अलग इलाकों में करीब 121 हाथी कई दलों में बंटकर विचरण कर रहे हैं। धान की फसल पकने के साथ ही हाथियों का रुख जंगलों से खेतों और आबादी वाले क्षेत्रों की ओर हो गया है। इससे किसानों की महीनों की मेहनत बर्बाद हो रही है। वहीं, हाथियों की आवाजाही से ग्रामीणों की सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है।
फसल बचाने के लिए हाथियों से भिड़ रहे ग्रामीण
लगातार फसल नुकसान से परेशान किसानों का धैर्य जवाब देने लगा है। सरगुजा वनवृत्त के अलग-अलग इलाकों से सामने आ रहे वीडियो और तस्वीरें स्थिति की गंभीरता बयां कर रहे हैं। खेतों को बचाने के लिए ग्रामीण अपनी जान की परवाह किए बिना हाथियों को भगाने में जुटे हैं। कहीं रात के अंधेरे में लाठी और मशाल लेकर हाथियों को खदेड़ा जा रहा है, तो कहीं दिन में युवा गुलेल और पत्थरों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
खेतों में करंट के तार बन रहे हाथियों की मौत का कारण
धान की फसल बचाने के लिए कुछ किसान खेतों के चारों ओर करंट प्रवाहित तार लगा देते हैं। यह तरीका इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा है। पिछले दिनों उदयपुर वन परिक्षेत्र में खेत के चारों ओर लगाए गए करंट की चपेट में आने से एक हाथी के शावक की मौत हो गई थी। ऐसी घटनाएं वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से गंभीर हैं और कानून के तहत दंडनीय अपराध भी हो सकती हैं।इंसान और हाथी, दोनों की जान पर खतरा
हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ता टकराव किसी बड़ी अनहोनी का कारण बन सकता है। वन विभाग का कहना है कि मैदानी अमला हाथियों की गतिविधियों पर नजर रख रहा है और गांवों में मुनादी कर लोगों को सतर्क किया जा रहा है। इसके बावजूद फसल को अप अंबिकापुर-बनारस मार्ग पर भी हाथियों की आवाजाही
अंबिकापुर-बनारस मार्ग पर भी हाथियों की आवाजाही
उदयपुर क्षेत्र में हाथियों का विचरण लगातार जारी है। हाथियों के दल मुख्य मार्गों के साथ गांवों की अंदरूनी सड़कों के आसपास भी देखे जा रहे हैं। दो दिन पहले अंबिकापुर-बनारस राष्ट्रीय राजमार्ग पर बंशीपुर के पास हाथियों का झुंड पहुंच गया था। इसके चलते सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई और यातायात प्रभावित हुआ।जंगल में चारा और पानी की व्यवस्था से कम हो सकता है टकराव
हाथियों और ग्रामीणों के बीच संघर्ष कम करने के लिए जंगलों में ही उनके भोजन और पानी की पर्याप्त व्यवस्था करना जरूरी है। तमोर पिंगला इसका एक उदाहरण माना जा रहा है। यहां हाथियों के लिए पर्याप्त चारा, बांस और प्राकृतिक जल स्रोतों को व्यवस्थित किया गया है। इसके चलते हाथियों की मौजूदगी सालभर इसी क्षेत्र में बनी रहती है और उनके जंगल से बाहर निकलने की घटनाएं कम होती हैं।







