Chhattisgarh Education News: बलरामपुर सरकारी फाइलों में स्कूल चल रहा है, हाज़िरी रजिस्टर में शिक्षकों के नाम दर्ज हैं और हर महीने तनख्वाह भी जारी हो रही है—लेकिन जब आप मौके पर पहुँचेंगे, तो आपको वहाँ न तो कोई छात्र मिलेगा और न ही स्कूल की इमारत। बलरामपुर जिले के विकासखंड बलरामपुर अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत बरदबंधा से सरकारी शिक्षा तंत्र की एक बेहद लाचार तस्वीर सामने आई है। यहाँ के प्राथमिक स्कूल में एक भी बच्चा नहीं पढ़ता, फिर भी दो शिक्षकों की नियुक्ति बरक़रार है।
11 लाख रुपए मंज़ूर हुए, सामान आया और गायब हो गया
कहानी आज की नहीं, बल्कि करीब 3-4 साल पुरानी है। जब शाासकीय प्राथमिक शाला बरदबंधा का पुराना भवन जर्जर हुआ, तो उसे ढहा दिया गया। उम्मीद जगी कि जल्द ही नया भवन बनेगा। साल 2022 में शासन की तरफ से 11 लाख रुपए की राशि भी स्वीकृत कर दी गई। ग्रामीणों के मुताबिक, ठेकेदार ने निर्माण सामग्री भी गाँव में गिरा दी थी। लेकिन उसके बाद क्या खिचड़ी पकी, किसी को नहीं पता। अचानक एक दिन सारा सामान वापस उठा लिया गया और निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हुआ। हालत यह है कि आज तक उस 11 लाख के बजट से नए भवन की नींव तक नहीं खोदी जा सकी।
रसोईघर में लगती थी क्लास, आख़िरी 3 बच्चों ने भी छोड़ा साथ
भवन न होने के कारण व्यवस्था को ज़िंदा रखने के लिए बीच का रास्ता निकाला गया। स्कूल की कक्षाएं उस किचन शेड में लगने लगीं, जहाँ बच्चों के लिए 'मिड-डे मील' (दोपहर का भोजन) पकता था। उसी तंग कमरे में एक तरफ खाना बनता और दूसरी तरफ बच्चे पढ़ते। अव्यवस्थाओं से तंग आकर अभिभावकों का सब्र टूट गया। बीते शैक्षणिक सत्र में कक्षा पहली के 2 और दूसरी का 1—कुल मिलाकर सिर्फ 3 बच्चे बचे थे। इस साल उनके परिजनों ने भी उनका नाम कटवाकर दूसरे गाँव के स्कूलों में दाखिला करा दिया। इस सत्र में अगस्त महीने तक शिक्षक बच्चों के आने की आस लगाए बैठे रहे, लेकिन किसी ने दाखिला नहीं लिया। नतीजा यह हुआ कि अब यह स्कूल पूरी तरह 'शून्य दर्ज संख्या' वाला बन चुका है।एक शिक्षक को कैंसर, दूसरे को दूसरे स्कूल में अटैच करने की तैयारी
कागज़ों पर यहाँ एक प्रधान पाठक और एक सहायक शिक्षक पदस्थ हैं। गाँव वालों ने शिकायत की थी कि एक शिक्षक लंबे समय से गायब रहते हैं। इस मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) संजू कनौजिया ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि संबंधित शिक्षक कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, जिस कारण वे छुट्टी पर हैं। BEO ने माना कि 2022 में भवन स्वीकृत होने के बाद भी नहीं बन पाया था। उन्होंने कहा कि अब छात्र न होने की स्थिति में प्रधान पाठक को पास के ही 'प्राइमरी शाला धनेशपुर' में अटैच किया जा रहा है और शासन के नियमानुसार आगे का कदम उठाया जाएगा।
ग्रामीणों में आक्रोश: "जाँच हो कि 11 लाख रुपए कहाँ गए?"
गाँव के लोगों का कहना है कि उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काट-काटकर गुहार लगाई, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। अगर समय रहते स्कूल बन जाता, तो छोटे-छोटे मासूम बच्चों को पढ़ाई के लिए दूसरे गाँव नहीं भटकना पड़ता। अब आक्रोशित ग्रामीणों ने प्रशासन से सीधी माँग की है कि 2022 में स्वीकृत हुए 11 लाख रुपए के बजट की निष्पक्ष जाँच कराई जाए—ताकि यह साफ़ हो सके कि भवन निर्माण का पैसा किसकी जेब में गया। इसके साथ ही गाँव में जल्द से जल्द नया स्कूल भवन तैयार करने की माँग भी उठाई गई है।

