क्या है जमीनी हकीकत और मरीजों की परेशानी?
मजबूरी में प्राइवेट सेंटर का रुख: सरकारी डॉक्टर पर्ची पर अल्ट्रासाउंड लिख तो देते हैं, लेकिन अस्पताल में सुविधा न होने पर मरीजों को बाहर प्राइवेट सेंटर्स का रुख करना पड़ता है।
जेब पर भारी खर्च: गर्भवती महिलाओं और आम मरीजों को हर बार की जांच के लिए 800 से 1500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं।
समय की बर्बादी: प्राइवेट सेंटर्स पर लंबी कतारों और रिपोर्ट के इंतजार में कई बार दो से तीन दिन खराब हो जाते हैं, जिससे समय पर इलाज शुरू नहीं हो पाता।
इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि मरीजों को उसी सरकारी अस्पताल में जांच की सुविधा मिल जाएगी, उसी दिन रिपोर्ट हाथ में होगी और भारी-भरकम खर्च से भी राहत मिलेगी।
डॉक्टरों की ट्रेनिंग और उसकी सीमाएं
स्वास्थ्य विभाग की इस योजना के तहत जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में सेवारत एमबीबीएस डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
प्रशिक्षण का स्वरूप: छह महीने की इस ट्रेनिंग के दौरान डॉक्टरों को हर रोज प्रैक्टिकल कराया जाएगा। सीनियर डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में वे अल्ट्रासाउंड करना सीखेंगे और अंत में एक परीक्षा पास करनी होगी। परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले डॉक्टरों को ही जांच करने की अनुमति मिलेगी।
दायरा और सीमाएं: इस योजना के जानकारों और वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ. शैलेष लुनावत का मानना है कि बेसिक जांच के लिए छह महीने की यह ट्रेनिंग पर्याप्त है, बशर्ते डॉक्टर अपनी सीमाओं को समझें।
क्या कर सकेंगे डॉक्टर: ये प्रशिक्षित डॉक्टर केवल पेट और पेल्विक का सामान्य अल्ट्रासाउंड ही कर सकेंगे।
क्या नहीं कर सकेंगे: कैंसर, जटिल गर्भावस्था (Complicated Pregnancy) या भ्रूण की बारीक जांच जैसे गंभीर और मुश्किल मामलों में ये डॉक्टर हाथ नहीं डालेंगे। ऐसे सभी जटिल केस विशेषज्ञ रेडियोलॉजिस्ट के पास ही भेजे जाएंगे।
इसके अलावा, कानून के पालन को लेकर भी प्रशासन पूरी तरह सख्त नजर आ रहा है। पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) कानून का कड़ाई से पालन कराना अनिवार्य होगा। हर जांच का रिकॉर्ड रखना, फॉर्म-एफ भरना और ऑनलाइन एंट्री करना जरूरी होगा। यदि कोई डॉक्टर नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो उसकी अनुमति तुरंत रद्द कर दी जाएगी और सख्त वैधानिक कार्रवाई भी होगी।
क्यों आ रही है रेडियोलॉजिस्ट की इतनी किल्लत?
इस पूरी समस्या की जड़ सरकारी व्यवस्था और निजी क्षेत्र के बीच का बड़ा फासला है। मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में इस समय कुल 22 रेडियोलॉजिस्ट ही बचे हैं।
सीटों की कमी: हर साल हजारों डॉक्टर एमबीबीएस की डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन इसके मुकाबले रेडियोलॉजी में एमडी की सीटें बेहद सीमित हैं। जब स्पेशलिस्ट डॉक्टर ही कम तैयार होंगे, तो सरकारी अस्पतालों में उनकी उपलब्धता कहां से सुनिश्चित होगी?
वेतन का भारी अंतर: सरकारी अस्पतालों में एक रेडियोलॉजिस्ट का शुरुआती वेतन लगभग 1 लाख से 1.25 लाख रुपये के बीच होता है, जबकि प्राइवेट सेंटर्स में यही डॉक्टर आसानी से 3 से 4 लाख रुपये तक कमा लेते हैं।
शहरों का आकर्षण: ज्यादातर डॉक्टर बड़े शहरों में रहना पसंद करते हैं, और छोटे जिलों या ग्रामीण इलाकों में पोस्टिंग से कतराते हैं। यही वजह है कि कई जिलों के अस्पतालों में आज की तारीख में एक भी रेडियोलॉजिस्ट नहीं बचा है।
सरकार की यह नई पहल भले ही एक अंतरिम व्यवस्था (Interim Arrangement) जैसी लगे, लेकिन अगर इसे पूरी पारदर्शिता और सख्ती से लागू किया गया, तो यकीनन आम आदमी की जेब का बोझ हल्का होगा और सरकारी अस्पतालों की गिरती साख को भी संबल मिलेगा।







