दुनियाभर में 6th जेनरेशन लड़ाकू विमानों को लेकर होड़ तेज हो गई है। इसी बीच भारत ने भी भविष्य के हवाई युद्ध की दिशा तय करने वाली तकनीकों में अपनी जगह बनाने के लिए फ्रांस के 'फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम' (FCAS) प्रोग्राम में शामिल होने की कवायद शुरू कर दी है। रक्षा मंत्रालय ने संसद को सूचित किया है कि इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में सहयोगी के रूप में जुड़ने के लिए प्रयास जारी हैं।
फ्रांस के साथ क्यों बन रही है बात ?
इस साल की शुरुआत में भारत ने नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित कर रहे दो प्रमुख वैश्विक गुटों में से किसी एक से जुड़ने का मन बनाया था। पहला समूह फ्रांस, जर्मनी और स्पेन का था, जबकि दूसरा ब्रिटेन, इटली और जापान का। हालांकि, जून में फ्रांस और जर्मनी के बीच मुख्य लड़ाकू विमान को संयुक्त रूप से विकसित करने पर सहमति नहीं बन सकी। इस बदलाव ने फ्रांस के लिए भारत जैसे नए और भरोसेमंद साझेदार के साथ आगे बढ़ने का रास्ता खोल दिया।
तकनीकी अंतर और भारत की जरूरत
वर्तमान में भारतीय वायुसेना का सबसे आधुनिक विमान 4.5 जेनरेशन का राफेल है। भारत खुद भी स्वदेशी 5th जेनरेशन लड़ाकू विमान (AMCA) पर काम कर रहा है, जिसके प्रोटोटाइप की उड़ान इस दशक के अंत तक तय है। लेकिन क्रिटिकल जेट इंजन और एडवांस्ड रडार जैसी तकनीकों में भारत अब भी पीछे है। 6th जेनरेशन के विमान 5th जेनरेशन की स्टील्थ क्षमता से कहीं आगे होंगे। इनमें एक मुख्य मानव-चालित जेट होगा, जो कॉम्बैट क्लाउड सिस्टम और आधुनिक ड्रोन्स के साथ तालमेल बनाकर हमला करेगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 5th जेनरेशन की तकनीकों में पीछे रहने के जोखिम को खत्म करने के लिए भारत को 6th जेनरेशन पर समानांतर काम करना होगा।चीन का दबाव और रणनीतिक मजबूरी
चीन जिस तेजी से अपनी वायुसेना का आधुनिकीकरण कर रहा है, वह भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के उपाध्यक्ष हर्ष पंत के मुताबिक, भारत रक्षा तकनीक के मामले में अक्सर एक या दो पीढ़ी पीछे रह जाता था, लेकिन चीन की बढ़ती ताकत के सामने अब देरी की कोई गुंजाइश नहीं है।