Janmashtami Special: हिंदू धर्म में जन्माष्टमी का पर्व बड़ी ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों को सजाते हैं और बाल गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जन्माष्टमी के पूजन में सबसे खास बात होती है कान्हा को लगाया जाने वाला '56 भोग'। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान को 56 तरह के व्यंजन ही क्यों अर्पित किए जाते हैं? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।
गोवर्धन पर्वत और इंद्रदेव का प्रकोप
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, एक समय ब्रज के लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारियों में लगे थे। बालक श्रीकृष्ण ने जब माता यशोदा से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि इंद्रदेव वर्षा करते हैं, जिससे फसलें अच्छी होती हैं। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि हमारी आजीविका और पशुओं का आधार गोवर्धन पर्वत और गायें हैं, इसलिए हमें इंद्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। ब्रजवासियों ने कान्हा की बात मानकर गोवर्धन पर्वत का पूजन शुरू कर दिया। इससे इंद्रदेव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए ब्रज में भयंकर बारिश और तूफान शुरू कर दिया।
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कनिष्ठा उंगली पर उठाया पहाड़
पूरे ब्रज पर जब बाढ़ का खतरा मंडराने लगा, तो भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों और पशु-पक्षियों की रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी) उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया। सभी ब्रजवासियों ने उस पर्वत के नीचे शरण ली। कृष्ण जी लगातार सात दिनों तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए, एक ही मुद्रा में गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। आखिरकार इंद्रदेव का अहंकार टूटा और उन्होंने बारिश रोक दी।