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Lord Krishna’s 56 Bhog Tradition
Lord Krishna’s 56 Bhog Tradition
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Janmashtami Special : भगवान श्रीकृष्ण को क्यों लगाया जाता है 56 भोग? जानें श्रीकृष्ण की रोचक लीला

Janmashtami Special: भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा गोवर्धन लीला से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत उठाए रखा और इस दौरान भोजन नहीं किया। इसके बाद ब्रजवासियों ने उन्हें 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित किए, जिसे छप्पन भोग की परंपरा से जोड़ा जाता है।

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प्रकाशित: 25 Aug 2026, 02:46 PM · अपडेट: 02 Oct 2026, 10:07 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Janmashtami Special: हिंदू धर्म में जन्माष्टमी का पर्व बड़ी ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों को सजाते हैं और बाल गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जन्माष्टमी के पूजन में सबसे खास बात होती है कान्हा को लगाया जाने वाला '56 भोग'। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान को 56 तरह के व्यंजन ही क्यों अर्पित किए जाते हैं? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

गोवर्धन पर्वत और इंद्रदेव का प्रकोप 

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, एक समय ब्रज के लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारियों में लगे थे। बालक श्रीकृष्ण ने जब माता यशोदा से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि इंद्रदेव वर्षा करते हैं, जिससे फसलें अच्छी होती हैं। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि हमारी आजीविका और पशुओं का आधार गोवर्धन पर्वत और गायें हैं, इसलिए हमें इंद्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। ब्रजवासियों ने कान्हा की बात मानकर गोवर्धन पर्वत का पूजन शुरू कर दिया। इससे इंद्रदेव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए ब्रज में भयंकर बारिश और तूफान शुरू कर दिया। 

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कनिष्ठा उंगली पर उठाया पहाड़ 

पूरे ब्रज पर जब बाढ़ का खतरा मंडराने लगा, तो भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों और पशु-पक्षियों की रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी) उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया। सभी ब्रजवासियों ने उस पर्वत के नीचे शरण ली। कृष्ण जी लगातार सात दिनों तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए, एक ही मुद्रा में गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। आखिरकार इंद्रदेव का अहंकार टूटा और उन्होंने बारिश रोक दी।

ऐसे हुई 56 भोग की शुरुआत 

माता यशोदा और ब्रज के लोग कान्हा को दिन में आठ बार (आठ पहर) भोजन कराया करते थे। चूंकि भगवान सात दिनों तक भूखे-प्यासे रहे थे, इसलिए सात दिनों के हिसाब से कुल 56 समय का भोजन (7 दिन × 8 पहर = 56) बकाया हो गया था। जब बारिश थमी और स्थिति सामान्य हुई, तो ब्रजवासियों ने प्रभु के प्रति अपना आभार और प्रेम प्रकट करने के लिए 56 अलग-अलग प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए और उन्हें प्रेमपूर्वक अर्पित किए। बस तभी से भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की यह पावन परंपरा चली आ रही है, जिसे आज भी जन्माष्टमी और गोवर्धन पूजा के अवसर पर बेहद श्रद्धा से निभाया जाता है।
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