क्यों बार-बार बढ़ानी पड़ रही है तारीख?
तारीख बढ़ाने के पीछे का मुख्य कारण शिक्षकों का इस परीक्षा से दूरी बनाना और लगातार बहिष्कार करना है। प्रदेश में लगभग 1.5 लाख शिक्षक इस परीक्षा के दायरे में आते हैं, लेकिन अब तक का आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है:
कुल प्राप्त आवेदन: अब तक केवल लगभग 22,000 फॉर्म ही जमा हुए हैं।
सरकारी शिक्षकों की भागीदारी: इन 22 हजार आवेदनों में से सरकारी शिक्षकों की संख्या महज 4,000 के आसपास है।
शिक्षकों के इस ठंडे रवैये के कारण विभाग की चिंता बढ़ गई है, जिसकी वजह से बार-बार अंतिम तिथि बढ़ानी पड़ रही है।
अफसरों के दबाव और शिक्षकों के आरोप
जैसे-जैसे समय बीत रहा है, शिक्षक संगठनों ने अधिकारियों पर अनुचित दबाव बनाने का आरोप लगाया है। संगठनों का कहना है कि जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और संकुल प्राचार्य व्यक्तिगत रूप से शिक्षकों पर फॉर्म भरने के लिए दबाव डाल रहे हैं। शिक्षक संघों का स्पष्ट रूप से मानना है कि प्रशासनिक दबाव बनाने के बजाय सरकार को शिक्षकों की जायज मांगों और आपत्तियों पर टेबल टॉक (सीधी बातचीत) करनी चाहिए।
आंदोलनकारी शिक्षकों की मुख्य दलील
परीक्षा का विरोध कर रहे शिक्षकों का तर्क उनकी सेवा अवधि और पदानुक्रम को लेकर है। शिक्षकों की प्रमुख आपत्तियां निम्नलिखित हैं:
सेवा के बदलते स्वरूप पर असमंजस: कई शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने 1998 में 'शिक्षाकर्मी' के रूप में अपनी सेवाएं शुरू की थीं। इसके बाद 2011 में वे 'अध्यापक' बने और 2024 में उन्हें 'उच्च माध्यमिक शिक्षक' का प्रभार दे दिया गया।
पद को लेकर भ्रम: शिक्षकों का सीधा सवाल है कि लगातार पदोन्नति और प्रभार बदलने के बाद अब उन्हें आखिर किस पद की पात्रता साबित करने के लिए यह परीक्षा देनी होगी?
शिक्षकों की मांग है कि सरकार पहले पद और पात्रता की स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करे, उसके बाद ही परीक्षा से जुड़ा कोई भी निर्णय आगे बढ़ाए।

