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जमीन विवाद
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अंबिकापुर (सरगुजा)

कब्जा : वन अधिकार पट्टा होने के बावजूद आदिवासी परिवार बेदखली के शिकार

सरगुजा जिले के मैनपाट क्षेत्र के कुनिया गांव में माझी जनजाति परिवारों ने दबंगों पर उनकी वन अधिकार पट्टे वाली जमीन और गोचर भूमि पर अवैध कब्जा करने का गंभीर आरोप लगाया है। पीड़ितों का कहना है कि वे पिछले दो वर्षों से लगातार जनदर्शन और प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
09 Jun 2026, 05:33 PM
सरगुजा

Surguja district के मैनपाट क्षेत्र स्थित ग्राम पंचायत कुनिया में माझी जनजाति परिवारों की जमीन पर दबंगों द्वारा कब्जा करने का गंभीर मामला सामने आया है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि जिस जमीन पर वे कई पीढ़ियों से खेती-बाड़ी कर रहे थे, उसी पर अब जबरन कब्जा कर लिया गया है।

पीड़ित माझी जनजाति परिवारों का कहना है कि उन्हें वन अधिकार अधिनियम के तहत उस भूमि का विधिवत पट्टा भी जारी किया जा चुका है, इसके बावजूद स्थानीय दबंगों ने मारपीट और धमकी देकर जमीन पर कब्जा कर लिया। जब भी वे अपनी जमीन खाली कराने की कोशिश करते हैं, उन्हें धमकाया जाता है और विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

कलेक्टर जनदर्शन में फिर पहुंचा मामला

ताजा अपडेट के अनुसार, कुनिया गांव के फागु माझी और मुन्नाराम माझी आज एक बार फिर कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचे और लिखित शिकायत सौंपकर जमीन वापस दिलाने की मांग की। पीड़ितों ने आरोप लगाया कि पिछले दो वर्षों से वे लगातार जिला प्रशासन और जनदर्शन में शिकायत कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। मामला केवल प्रशासनिक स्तर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि तहसील न्यायालय तक भी पहुंचा। इसके बावजूद पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिल सका। इसी कारण आदिवासी परिवार लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

गोचर भूमि पर भी कब्जे का आरोप

पीड़ितों ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि गांव के राम पुकार यादव, नरेश यादव और अनुप यादव द्वारा न केवल पट्टे की जमीन बल्कि गोचर मद की भूमि पर भी कब्जा किया गया है।
गोचर भूमि वह क्षेत्र होता है जहां गांव के पशु चरते हैं, लेकिन आरोप है कि इस पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया है।

प्रशासनिक लापरवाही 

स्थानीय लोगों का कहना है कि मैनपाट क्षेत्र में सरकारी और आदिवासी भूमि पर कब्जे के कई मामले लंबे समय से लंबित हैं। आरोप यह भी हैं कि राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से दस्तावेजों में हेरफेर किया जा रहा है, जिससे गरीब आदिवासी परिवारों को उनके हक की जमीन नहीं मिल पा रही है।
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