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पुहपुटरा में सोनाबाई की कला
पुहपुटरा में सोनाबाई की कला
अंबिकापुर (सरगुजा)

सरगुजा की मशहूर कलाकार सोनाबाई की विरासत संकट में, संग्रहालय पर वर्षों से ताला

सरगुजा की प्रसिद्ध भित्तिचित्र कलाकार सोनाबाई की कला अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहचान बना चुकी है, लेकिन उनके गांव पुहपुटरा में उनकी विरासत संरक्षण के अभाव में उपेक्षित है। करीब 15 लाख रुपये की लागत से बना संग्रहालय वर्षों से बंद पड़ा है।

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प्रकाशित: 21 Aug 2026, 12:14 PM · अपडेट: 01 Oct 2026, 11:08 PM
सरगुजा
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
सरगुजा की लोककला को देश से लेकर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध भित्तिचित्र कलाकार सोनाबाई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके बनाए चित्र आज भी उनकी कला की कहानी कहते हैं। हालांकि संरक्षण और देखरेख के अभाव में उनकी यह अनमोल विरासत धीरे-धीरे मिटने की स्थिति में पहुंच रही है। हैरानी की बात यह है कि उनकी स्मृति और कलाकृतियों को सुरक्षित रखने के लिए लखनपुर क्षेत्र के पुहपुटरा गांव में करीब 15 लाख रुपए की लागत से बनाया गया संग्रहालय लंबे समय से बंद पड़ा है। 
पुहपुटरा गांव सोनाबाई की कर्मभूमि रहा है। वर्ष 2008 में उनके निधन के बाद भी उनके घर की दीवारों पर बनाए गए भित्तिचित्र उनकी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता की गवाही देते हैं। मिट्टी, दीवार और प्राकृतिक रंगों से तैयार इन चित्रों में सरगुजा की लोक परंपरा, संस्कृति और ग्रामीण जीवन की झलक दिखाई देती है। 

संग्रहालय वर्षों से बंद
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंची सोनाबाई की कला

सोनाबाई की पहचान केवल सरगुजा या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही। उनकी भित्तिचित्र कला विदेशों तक पहुंची और उन्होंने अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया में अपनी कला का प्रदर्शन करने के साथ प्रशिक्षण भी दिया। उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई प्रतिष्ठित हस्तियों के हाथों उन्हें सम्मानित किया गया था। आज उसी कलाकार की विरासत अपने गांव में संरक्षण का इंतजार कर रही है। सोनाबाई की कलाकृतियों और उनके जीवन से जुड़ी उपलब्धियों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से पुहपुटरा में करीब 15 लाख रुपए की लागत से संग्रहालय तैयार किया गया था। उम्मीद थी कि यहां उनकी कला को सहेजने के साथ देश-दुनिया से आने वाले लोग सरगुजा की इस खास लोककला से परिचित हो सकेंगे। लेकिन निर्माण के वर्षों बाद भी संग्रहालय नियमित रूप से संचालित नहीं हो पाया। भवन पर ताला लगा है और जिस जगह को सोनाबाई की कला के संरक्षण का केंद्र बनना था, वह फिलहाल इस्तेमाल से बाहर है। 

परिवार चाहता है कला का प्रशिक्षण केंद्र बने गांव

सोनाबाई का परिवार केवल संग्रहालय को खोलने की मांग तक सीमित नहीं है। परिवार चाहता है कि गांव के बच्चों और युवाओं को भित्तिचित्र कला का प्रशिक्षण दिया जाए। साथ ही सोनाबाई की कलाकृतियों को सुरक्षित रखने, उनकी कला पर शोध कराने और पुहपुटरा को लोककला के केंद्र के रूप में विकसित करने की जरूरत बताई जा रही है। सोनाबाई के बेटे दरोगा राजवाड़े का कहना है कि समय रहते संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं हुए तो उनकी मां की कला और उससे जुड़ी विरासत को बचाना मुश्किल हो सकता है। 

सरकार ने संरक्षण का दिया भरोसा

सोनाबाई की कला के संरक्षण का मुद्दा अब सरकार तक भी पहुंच चुका है। संस्कृति, पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री राजेश अग्रवाल ने उनकी कला को सुरक्षित रखने और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में काम करने की बात कही है। मंत्री ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए विभाग की ओर से कार्ययोजना तैयार करने की बात कही है। उन्होंने पुहपुटरा में सोनाबाई की स्मृति में बनाए गए संग्रहालय को शुरू कराने का आश्वासन भी दिया है।

विरासत बचाने के लिए अब ठोस कदम की जरूरत

सोनाबाई की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां महज सजावटी चित्र नहीं हैं। इनमें सरगुजा की लोक संस्कृति, परंपराओं और ग्रामीण जीवन की झलक दिखाई देती है। यही वजह है कि उनकी कला को संरक्षित करना केवल एक कलाकार की यादों को सहेजना नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का भी सवाल है। अब निगाहें सरकार के आश्वासन पर हैं। देखना होगा कि पुहपुटरा के संग्रहालय का ताला कब खुलता है और सोनाबाई की कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहचान बनाने वाली इस कलाकार की विरासत अपने ही गांव में लंबे समय से संरक्षण की राह देख रही है।
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