Organic Farming: कोरिया जिले के एक किसान ने पारंपरिक खेती से हटकर बागवानी और जैविक खेती में अपनी अलग पहचान बनाई है। बैकुंठपुर विकासखंड के ग्राम उमझर निवासी राजेंद्र प्रसाद राजवाड़े पिछले सात वर्षों से फलों की उन्नत खेती कर रहे हैं। कभी धान की खेती तक सीमित रहने वाले राजेंद्र ने आज 15 एकड़ जमीन पर आम और अमरूद का बगीचा तैयार कर लिया है। खास बात यह है कि वे बिना रासायनिक खाद के जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं। उनकी इस पहल से गांव के दूसरे किसान भी जुड़ रहे हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र से मिली शुरुआत की प्रेरणा
राजेंद्र प्रसाद राजवाड़े (42) ने करीब सात साल पहले कृषि विज्ञान केंद्र कोरिया से आम के पौधे लेकर फल उत्पादन की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे उन्होंने अपने बगीचे का विस्तार किया और आज 15 एकड़ में आम और अमरूद के पौधे तैयार कर चुके हैं। अब इन पेड़ों में फल भी आने लगे हैं। आम और अमरूद के साथ उन्होंने लीची, चीकू और सीताफल के पौधे भी लगाए हैं। वे खुद आम और अमरूद के ग्राफ्टिंग पौधे तैयार करते हैं, जिससे खेती के काम में उन्हें अतिरिक्त सुविधा मिलती है।
आम के बगीचे के बीच टमाटर और अदरक की खेती
राजेंद्र की खेती की खासियत सिर्फ फल उत्पादन तक सीमित नहीं है। वे आम के पेड़ों के बीच खाली पड़ी जमीन का भी बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने ड्रिप सिंचाई प्रणाली के साथ अंतरवर्तीय खेती अपनाई है। आम के पेड़ों के बीच वे टमाटर और अदरक की फसल लेते हैं। इसके अलावा खेत में जिमीकांदा यानी सूरन और खेतों की मेड़ पर औषधीय पौधे सतावर भी लगाए हैं। इस तकनीक से एक ही खेत में अलग-अलग फसलों का उत्पादन हो रहा है, जिससे उन्हें आम और अमरूद के अलावा अतिरिक्त आमदनी भी मिल रही है।
गेंदे के फूलों से करते हैं कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण
बगीचे में फसलों को कीटों से बचाने के लिए राजेंद्र रासायनिक दवाओं के बजाय प्राकृतिक उपायों को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने आम और अमरूद के पेड़ों के बीच गेंदे के फूल लगाए हैं। ये फूल नेमाटोड सहित कुछ हानिकारक कीटों के नियंत्रण में मदद करते हैं। इससे रासायनिक दवाओं पर होने वाला खर्च कम होता है और मिट्टी की गुणवत्ता भी सुरक्षित रहती है। राजेंद्र अपने पूरे 15 एकड़ के बगीचे में गोबर की खाद का इस्तेमाल करते हैं। उनका प्रयास है कि खेती में रासायनिक खादों और दवाओं का उपयोग किए बिना अच्छी गुणवत्ता वाली उपज तैयार की जाए।पांच किसान भी जुड़े, स्थानीय बाजार में बेचते हैं उपज
राजेंद्र के इस प्रयास में गांव के पांच अन्य किसान रामूराम, नत्थू दास, मनोज, सियाराम और रघुनंदन भी सहभागी हैं। उनकी उपज स्थानीय बाजारों और व्यापारियों के माध्यम से बिकती है, जिससे उन्हें अच्छा दाम मिल जाता है। अदरक और जिमीकांदा जैसी फसलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। ऐसे में राजेंद्र बाजार में बेहतर कीमत मिलने का इंतजार करते हैं और उचित दाम मिलने पर उपज बेचते हैं। वहीं, सतावर जैसे औषधीय पौधों की आयुर्वेदिक कंपनियों और जड़ी-बूटी कारोबारियों के बीच मांग रहती है।ड्रिप सिंचाई से पानी और समय दोनों की बचत
राजेंद्र ने अपने बगीचे में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम अपनाया है। इससे पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुंचता है और सिंचाई में पानी की बर्बादी कम होती है। पहले खेत में सिंचाई के लिए पूरा दिन लग जाता था और हजारों लीटर पानी खर्च होता था। अब कम समय और कम पानी में पौधों को जरूरत के मुताबिक नमी मिल जाती है। राजेंद्र का कहना है कि खेती की शुरुआत में काफी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन अब बगीचे का काम पहले से आसान हो गया है। आने वाले समय में वे खाली जगहों पर अमरूद के और पौधे लगाने के साथ फार्म में देसी मुर्गी पालन शुरू करने की योजना भी बना रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों ने सराहा खेती का तरीका
कृषि विज्ञान केंद्र कोरिया के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक कमलेश कुमार सिंह और विजय अनंत ने राजेंद्र की खेती के तरीके को वैज्ञानिक और लाभदायक बताया है। उनका कहना है कि आम और अमरूद के बगीचे में गेंदे के फूल लगाने से नेमाटोड और कुछ अन्य हानिकारक कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण करने में मदद मिलती है। इससे रासायनिक दवाओं पर निर्भरता और खेती की लागत कम होती है। साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में भी सहायता मिलती है। राजेंद्र प्रसाद राजवाड़े का यह प्रयास बताता है कि पारंपरिक खेती के साथ नई तकनीकों और फसल विविधीकरण को अपनाकर किसान अपनी आमदनी के बेहतर विकल्प तैयार कर सकते हैं।







