कर्म ही मेरा धर्म और कर्तव्य है'
अपने 25 साल के इस सफर का उल्लेख करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि जीवन में मिली हर जिम्मेदारी को उन्होंने निस्वार्थ भाव से निभाने का प्रयास किया है।
"मेरे लिए कर्म ही सब कुछ है, कर्म ही मेरा धर्म है और इसे ही मैं अपना प्राथमिक कर्तव्य मानता हूँ। प्रयास कभी रुकने नहीं चाहिए। मेरे लिए यह केवल एक सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि देश और देशवासियों के प्रति मेरी साधना है।"
उन्होंने कहा कि उन्हें फल या श्रेय की कोई चिंता कभी नहीं रही; देश ने अवसर दिया और परिस्थितियों ने उन्हें लगातार सीखने का मौका दिया, जिसके बल पर वे अविरल जनसेवा में जुटे हैं।
मैं महत्वाकांक्षा के लिए नहीं, मिशन के लिए जीने वाला व्यक्ति हूँ'
राजनीतिक चमक-धमक और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से दूर रहने की अपनी सोच को साझा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार के मुखिया के रूप में 25 साल पूरा होना कई लोगों के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन वे इसे इस रूप में नहीं देखते।
उन्होंने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा कि 50 साल की उम्र तक उनका जीवन जंगलों में आदिवासियों के बीच, पहाड़ों में और भारतीय जनता पार्टी के एक साधारण संगठन कार्यकर्ता के रूप में बीता।
"अगर मेरे भीतर चुनावी राजनीति में चमकने या पद पाने की चाहत होती, तो मैं बहुत पहले ही इस मैदान में उतर सकता था। लेकिन यह मेरा स्वभाव नहीं रहा। मैं क्या बनूँगा, मेरा क्या होगा—यह विचार मेरे मन में कभी नहीं आया। मेरी सीख यही रही है कि मैं महत्वाकांक्षा (Ambition) के लिए नहीं, बल्कि एक मिशन के लिए जीने वाला इंसान हूँ।"
आज भी खुद को एक विद्यार्थी ही मानता हूँ'
अपने भीतर सीखने की ललक का ज़िक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने अपने स्कूली दिनों की यादें ताजा कीं। उन्होंने बताया कि गुजरात के बड़नगर में जब वे स्कूल जाते थे, तो क्लास में सबसे पहले पहुँचने वाले छात्रों में हमेशा उनका नाम होता था।
शिक्षक द्वारा दी गई सीख और जीवन के विभिन्न पड़ावों का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा:
सीखने की ललक: बचपन की वह उत्सुकता आज भी बनी हुई है और वे खुद को आज भी एक विद्यार्थी ही मानते हैं।
विनम्रता का पाठ: जीवन में जिसने भी उन्हें सिखाया, उसने उन्हें विनम्र रहना ही सिखाया।
विरोधियों से सीख: साथ देने वालों ने उन्हें विश्वास की ताकत दिखाई, तो विरोध करने वालों ने लोकतंत्र के वास्तविक सामर्थ्य का अहसास कराया।
संकट धैर्य की परीक्षा बने, सिद्धियों ने दिया आगे बढ़ने का साहस'
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके जीवन की कोई भी घटना व्यर्थ नहीं गई और हर चुनौती ने उन्हें कुछ न कुछ नया सिखाया है:
मोरबी जलप्रलय: इसने उन्हें संकट के समय दिन-रात सेवा कार्यों में जुटने का मार्ग दिखाया।
भूकंप का दौर (कच्छ/पुंछ): पुनर्निर्माण और आपदा प्रबंधन की बारीकियों से रूबरू कराया।
चंद्रयान की शुरुआती असफलता: गिरकर दोबारा उठने और लक्ष्य की ओर बढ़ने का जज्बा दिया।
कोरोना महामारी: संकट के समय पूरे देश की एकजुटता और सामूहिक चेतना के महत्व को सिद्ध किया।
मीडिया के अनुभव: खट्टे-मीठे अनुभवों के बीच तटस्थ रहकर आगे बढ़ते रहने की सीख मिली।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि देश के हर गाँव और गरीब व्यक्ति से उन्हें यह प्रेरणा मिली कि भले ही साधन और संसाधन सीमित हों, लेकिन सपने हमेशा बड़े होने चाहिए और हौसले बुलंद होने चाहिए।

