Pyre Movie Review: उत्तराखंड के खाली होते गांव, बुजुर्गों का अकेलापन और अपनों के लौटने का इंतजार। निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म Pyre इन मुद्दों को बेहद संवेदनशील तरीके से पर्दे पर उतारती है। फिल्म की कहानी कई जगह भावुक करती है, तो कुछ पल ऐसे भी हैं जो चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। पहाड़ों की खूबसूरती अक्सर लोगों को आकर्षित करती है, लेकिन इन पहाड़ों के पीछे छिपे अकेलेपन और पलायन की पीड़ा पर कम ही बात होती है। फिल्म 'पायर' इसी अनकही कहानी को सामने लाती है।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की शुरुआत उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ी इलाकों से होती है। यहां करीब 80 साल के पदम सिंह (पदम सिंह कापड़ी) अपनी बुजुर्ग पत्नी तुलसी (हीरा देवी) के साथ रहते हैं। दोनों की जिंदगी पहाड़ों के बीच बीत रही है, लेकिन गांव में अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं बची है। रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में ज्यादातर लोग गांव छोड़कर शहर जा चुके हैं। पदम सिंह का बेटा हरिया भी करीब 28 साल पहले काम की तलाश में शहर गया था, लेकिन उसके बाद वापस नहीं लौटा। उम्र के इस पड़ाव पर पदम सिंह और तुलसी एक-दूसरे का ही सहारा हैं। तुलसी की तबीयत खराब रहती है और उसे शहर ले जाने के लिए भी गांव के कुछ गिने-चुने लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन अब हालात और मुश्किल हो रहे हैं। गांव में उनका साथ देने वाले लक्ष्मण (सुभाष चंद्रा) और जीवन (शुभम चौधरी) भी जल्द ही गांव छोड़ने वाले हैं। ऐसे में पदम सिंह को लगता है कि उनके पास जीने का सहारा भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
कैसा है फिल्म का निर्देशन और अभिनय?
लेखक और निर्देशक विनोद कापड़ी ने पलायन जैसे गंभीर मुद्दे को बिना किसी भारी-भरकम भाषण के कहानी का हिस्सा बनाया है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है। इसमें नाटकीय घटनाओं से ज्यादा रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-छोटे पल असर छोड़ते हैं। पदम सिंह का गांव के बचे हुए लोगों को रोकने के लिए अपनी बकरियां तक दे देना भावुक कर जाता है। वह किसी भी तरह चाहता है कि गांव फिर से आबाद रहे। लेकिन जब उसके सामने एक-एक करके लोग गांव छोड़ते जाते हैं, तो उसकी बेबसी साफ दिखाई देती है। फिल्म में मौत और अकेलेपन को लेकर कुछ संवाद ऐसे हैं, जो हंसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करते हैं। पति-पत्नी के बीच होने वाली छोटी-छोटी नोकझोंक कहानी को भावनात्मक बोझिल होने से बचाती है।
Cinematography & music
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी कहानी को और प्रभावशाली बनाती है। सिनेमैटोग्राफर मानस भट्टाचार्य ने उत्तराखंड के पहाड़ों, सुनसान गांवों, पुराने घरों और वहां की जिंदगी को खूबसूरती से कैमरे में उतारा है। फिल्म के दृश्य सिर्फ पहाड़ों की सुंदरता नहीं दिखाते, बल्कि उनके खालीपन को भी महसूस कराते हैं। अमन पंत का संगीत और पहाड़ी लोकगीत कहानी के माहौल के साथ अच्छी तरह घुल-मिल जाते हैं। संगीत कहीं भी जबरदस्ती कहानी पर हावी नहीं होता।फिल्म की खासियत और कमजोर पक्ष
पायर की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी और भावनात्मक जुड़ाव है। यह फिल्म पलायन की समस्या को सरकारी आंकड़ों या लंबे संवादों के बजाय एक बुजुर्ग दंपती की जिंदगी के जरिए समझाती है। हालांकि, फिल्म की गति कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है। इसमें तेज घटनाक्रम और लगातार रोमांच की उम्मीद करने वालों को थोड़ी निराशा हो सकती है। यह फिल्म धैर्य के साथ देखी जाने वाली कहानी है, जहां खामोशी और छोटे-छोटे दृश्य भी बहुत कुछ कहते हैं।







